हर कोई सोचता है
हीरे जेसे कीमती दिन मिलेगे
सुहानी रातें जगमगाया करेंगी.
पर किसे मालूम होता है
जागती आँखों के ख्वाब
बुलबुलों से भी कहीं नाज़ुक होते हैं
हकीकत की सख्त ज़मीन
पर
हवामहल कब खड़े रह पाते हैं.
जिंदगी के सफर में
फूलों की वादियों में मिलने वाले साथ
काँटों की नोक पर जब चलते हैं
रिश्तों का कद
ओस के कतरों से भी छोटा हो जाता है.
पता ही नहीं कब लोग
लम्हों की धूप के
जंगल में
अपनी खुशबु खो देते है
जेसे वक्त की कब्र पर रखे रह गए
मुरझाते हुए फूल.
3 टिप्पणियां:
'फूलों की वादियों में मिलने वाले साथ
काँटों की नोक पर जब चलते हैं
रिश्तों का कद
ओस के कतरों से भी छोटा हो जाता है.'
कितनी खरी बात कह गयी कविता...!
बहुत कोमल अभिव्यक्ति!
सादर!
दिली शुक्रिया अनुपमा जी किसी गुनिजन से प्राप्त १ टिप्पणी भी मेरे लिए लाख बराबर है
आपकी कई सारी रचनाएँ पढ़ीं ...बहुत अच्छी लगीं...यथार्थ की जमीन पर उकेरीं हुईं हैं ..
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