रविवार, 20 नवंबर 2011

दो कविताएँ


1.
वह साज़
महफिलों का उजाला,
अनेक धुनों का जनक था
कहीं भीतर से टूट कर
अब खामोश है.
सतही रूप में अच्छा भला
पर नाकारा
यूँही कबाड सा पड़ा है.
गीतों को नए बाजे मिल गए हैं
बेसुरे ही सही
लोगों को नचवाने के लिए
काफी हैं.
2.
जो दिखता है बहुधा
वेसा होता नहीं
किसको पता
मुस्कान ओढ़े
मुखोटे के पीछे
सूनी आँखों में
जमे हुए अहसास का  
बर्फीला समुद्र जमा है.
  

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