बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

दर्पण झूठा है



चेहरों के भीतर देखा ही नहीं
आईने ने सच बोला ही नहीं 

नज़ारो से उलझ आई निगाह
मंज़र के भीतर देखा ही नहीं 

दुनिया की खोज करने वाला
अपने आप से मिला ही नहीं

मरीज़ेगम मोत को साथ रख
मय रोग भी है दवा ही नहीं 

एक परछाई है परदे के पीछे
उस पार कोन है पता ही नहीं

माटी राख धुंआ धूल आलम
आखिर में कुछ बचा ही नहीं

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