चेहरों के भीतर देखा ही नहीं
आईने ने सच बोला ही नहीं
नज़ारो से उलझ आई निगाह
मंज़र के भीतर देखा ही नहीं
दुनिया की खोज करने वाला
अपने आप से मिला ही नहीं
मरीज़ेगम मोत को साथ रख
मय रोग भी है दवा ही नहीं
एक परछाई है परदे के पीछे
उस पार कोन है पता
ही नहीं
माटी राख धुंआ धूल आलम
आखिर में कुछ बचा ही नहीं
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