खुशबु के झोंके की तरह नहीं आता अब !
ना मेरी रातों के अँधेरे पर चांदनी बन कर उतरता
है कोई.
आहटें गुज़रती तो हैं रात ढले तक सडक पर
जागती आंखों में ख्वाब बन कर कोन ठहरता है?
कमरे में बस एक जम गया सन्नाटा होता है
या फिर दीवार पर खुद अपना साया होता है.
यूँ ही गुजर रही हैं शबो-रोज की
घडियाँ
सूरज की पहली किरण के साथ
कलेंडर के पालने में
उजाला तारीख बन कर जन्मता है.
निराशा की धूप नयी नाकामी के मज़ार पर
हसरतों के फूल बिखेर जाती है,
इस तरह लम्हों की मरीचका का मारा
एक और नामुराद
दिन,
वक्त की रेत में प्यासा दफन हो जाता है.
1 टिप्पणी:
Behtareen.,
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