गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

अनसुलझी पहली


इस चिड़ियाघर की चावं-चावं में
कोयल की उन्मुक्त कूक
सुनने की आस है फ़िज़ूल.
बेहतर है कहीं अपने भीतर
स्वरलहरी तलाश.
तुझ पर खुल सकता है
आवाजों का तलिस्म,
तितली के रेशमी परों की
सरसराहटह का गीत.  
कली के चटखने की सदा
में छिपा फूल खिलने का राज़.
जाती आहटों के तले कुचली गयी  
चरमराती
सूखी पत्तियों की वेदना
ज़रूर कुछ समझा सकती है तुझे.
देख तो सही आवारा भवंरों केसे  
पुष्पों के आनन पर
प्रेम कहानियाँ लिख रहे है.
गोर से सुनने का प्रयास कर  
क्या पता गहरे नीले आकाश तले  
तुझ पर बयान हो जाए
ऊँची डाल पर गाते पंछी का वह नगमा   
जो अभी तक
किसी सुर में उतरा ही नहीं.   

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