१.
मंदिरों की आरती और
मस्जिदों में नमाज़ के दोरान
दरख्तों की टहनियों में
पक्षीयों की चहचहाट सुन कर
कई बार सोचता हूँ
ऊँचे आकाश में उड़ने वाले
इन बेमज़हब जीवों की बंदगी
कहीं मुझसे ऊँची तो नहीं.
२.
हज़ार बंधनों में है जीवन
यूँही कई बार सोचता हूँ
धरती की झंझटों से दूर
काश आकाश में उड़ता
स्वछंद पक्षी होता.
पर किसे मालूम होता है
भाग्य का लिखा
तब भी क्या पता
पंख कतरा केदी बनकर
पिंजरे में लटका रहता.
2 टिप्पणियां:
इन बेमज़हब जीवों की बंदगी
कहीं मुझसे ऊँची तो नहीं.
सच!
अनुपमा जी ब्लॉग पर आने के लिए बहुत शुक्रिया.
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