शनिवार, 3 दिसंबर 2011


कहा गया था
आसान होगा सफ़र
लाखों हरे दरख्तों बलि लेकर
चोडी भी हुई राजमार्ग की सड़कें.
मगर तवायफ की जवानी सा
चमकीला हुस्न
उधड़ गया–बिखर गया
चंद दिनों में.
वही सडक अब
हज़ार पेबंद लगाए
अपनी ओड़नी में
टूटा फूटा बदसूरत जिस्म लिए   
मुसाफिरों से माफ़ी मांगती
लग रही है.
दलाल-भडवे सब
मिलवाट के हिस्से लेकर
कही ओर भ्रस्टाचार की चाशनी
चाटने में जा लगे.
सफ़र जो था सो है वेसा ही
वही है फासला
बस और हवाईजहाज़ के बीच.
२.
हवा पानी अन्न फल सब्जी सब किये विषेले
हर जिंदगी को लाभ की प्रयोगशाला बनाकर
मोत के व्योपारी स्वयं ह्रदय पकडे मर रहे है   
हमारा हाजमा तो देखो जिंदा हैं जहर खाकर.       

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