न था कुछ तो खुदा था, कुछ ना होता
तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं
तो क्या होता
हज़रत ग़ालिब ने ये शेर कोई डेढ़ सदी पहले कहा था और
मुझे आज सवेरे अखबार पढते वक्त अचानक याद आया जब गाड
पारटीकल की खबर ने साबित किया गाड था है और सदा रहेगा.अजीब बात यह लगी कि गाड पारटीकल को तो वेज्ञानिकों ने मान लिया सारे मीडिया में
उसी का चर्चा है पर गाड के होने न होने की बहस खामोश सी है जेसे सदियों से आपस उलझते
आस्तिक नास्तिक थक गए हों.भाई हम एशिया
वाले तो सदा से कहते रहे हैं कण कण में खुदा/भगवान/वाहेगुरु या गाड जो भी कहो मोजूद
है पर दिखाई नहीं देता .वह अजर अमर है उसका कोई आरम्भ या अंत नहीं है. वह निराकार
है आदि आदि.अब २७ मील लंबी गुफा में
बहुत कुछ या कहो प्रोटोन युद्ध करा कोई कण देखे है पश्चिम के वेज्ञानिकों ने चाहे इस खोज पर भी मूल विचार
भारत के ही बासु साहिब का था जो बोसान बन गया.ये और बात है कोई गोरा होता तो अपनी
खोज पर नोबल इनाम ले उड़ता. नंगे फ़कीर के देश वाले को दिमाग को इज्ज़त कोन दे .नाम
को तो गाड पारटीकल की खोज में कोई १११ देशों के बंदे शामिल थे जिनकी इबादत /मेंहनत
का असल फल जाने किन्होने चखा .ख्याल तो यह है कि जेसा सदा से होता आया है आम चूसने वाले तो कोई
और ही रहेंगे फेंके छिलकों से जिन्हें बहलना है ज़रूर बहलें.
कहा यह जा रहा है ये होगा वो होगा दुनिया
के प्रगति पथ पर क्रान्ति आ जायगी जेसे गाड पारटीकल धरती पर स्वर्ग उतार लाएंगे.अजर
अमर होकर आदमी चाँद तारों पर जाके बादशाहत करेगा.चलो जो भी हो सही हो पर इस
निराशावादी मन में जाने क्यों ख्याल आ रहा है.वह काला विचार यह है कि आणुविक शक्ति
और अपने मारक हथियारों के बल पर यूनी पोलार विश्व व्यवस्था का सपना देखने और उसे
साकार करने में लगे महाबली इस नए अजूबे से कही सचमुच खुदाई का दावा न करने लगें.
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