बुधवार, 4 जुलाई 2012

दिशाहीन ...


चींटियों के लिए अब तिनके के सहारे भी कहाँ
बन्दर तो हुए पार जिराफों की गर्दन पकड़ कर

कटी पतंग की तरह दिशाहीन हुए फिर रहे हो
बताओ क्या पाया वक्त की हवाओं से लड़ कर

अपने सामने से जाने पर अब शिकवा है केसा
तुमने क्यों नहीं उठाया था जाम आगे बढ़ कर

जलते घरों के धुए में सिमट कर रह गए लोग
बहुत उजाले की सोचते थे ओकात से बढ़ कर

लहरे आज भी आकर उसका ठिकाना पूछती हैं  
जाने कोन नाव गयी थी किनारे से बिछड कर
.............................
अपने पते जा पहुचे लिफाफे जो बा-टिकट गए
कुछ खत कोरे रह गए खामोशी में सिमट कर   

2 टिप्‍पणियां:

अनुपमा पाठक ने कहा…

'कुछ खत कोरे रह गए खामोशी में सिमट कर'
मौन सशक्तता से बोल उठा है आपकी अभिव्यक्ति में!
बहुत खूब!
सादर!

rafat ने कहा…

बहुत शुक्रिया आपका मोहतरमा