गुरुवार, 19 जुलाई 2012

कल बहुत दरख्त थे



  (एक बात)

तुम्हे अपने गावं गए
कितने वर्ष या दिन गुजरें हैं,
कई साल हो गये अगर
अपनी ज़मीन से लोटे
तो समझो
तुम्हारी जड़ें कब की कट गयी होंगी
अगलों की निशानी खेतों पर
भूमाफियाओं के मकडजाल
बेतरतीब कालोनियों का
कनछलानुमा केंसर बसा चुके होंगे.
हुक्का गुडगुड़ाते थे नीम की जिस घनी
छाव तले पुरखे
बेरहम कुल्हाड़े की धार से कट कर
धम से गिर पड़ा होगा
अपने बेरहम वासियों की दरिंदगी पर
धरती ज़रूर हिली होगी
किसने तब
हरियाली का दर्द महसूस किया होगा

(दूसरी बात)

कई दिन ही हुए है अगर
अपनी ज़मीन से आपको लोटे
तो ध्यान करो
बस स्टेंड के रास्ते पर खडा
लेहस्वों का बड़ा पेड देखा ?
जिसपर लाल चोंच वाले सुंदर तोते
गोंद भरे मीठे रस का
स्वाद लिया करते थे
क्या कहा नहीं देखा
तुमने कोई दरख्त नहीं देखा
तो फिर ज़रूर
गाव की सडक चोडी हो गयी होगी 

(तीसरी बात )


नंगे पहाड
बंजर धरती
प्यासे खेत
आत्महत्या करते किसान
जिंदगी तेरे होने का क्या
अर्थ है यही 
कंक्रीट के दडबो में केद जिंदगी
तुझे पता भी है
कब सुबह की शीतल पवन चली
अब शाम ने सिन्दूर भर के
रात के बिस्तर पे कदम रखा
एक अदना सोच है यह
अपने मतलबों के सिवा
आदमी को
अपनी दुनिया से कोई सरोकार नहीं.
............
यहाँ किसे परवाह है बस्ती के जलते हुए घरों  की
सब अपने छप्परों की तरफ पानी लिए दोड रहे हैं.
       



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