शनिवार, 14 जुलाई 2012

सांसों का दिशाहीन सफर


साँसों के दिशाहीन सफर में
मंजिले समझ कर
जर, जोरू और ज़मीन के लिए
सदा ही ताकतवर
कमजोर के साथ
बलात्कार करता रहा है. 
कभी मजहब के नाम पर
कभी अधिकार के नाम पर
कभी इन्साफ के नाम पर
अनगिनत बहानो से
तलवारों की नोकों ने
इतिहास के पन्ने
रक्तरंजित किये हैं.
खंडहर बने
महल दुर्ग किले गवाह है
आदमी ने
साँसों के दिशाहीन सफर में
अपने अंजाम की कब खबर रखी
सामान सो बरस का पल की खबर नहीं
कहने वाले को कहाँ ख्याल है
जिंदगी की शाम में
कभी सुबह नहीं होती.
गुलामी की जंजीरों से
कंटीली सरहदों से
बड़े कातिल बमों से
धरती की छाती को
छलनी करने वाला
मानवता के नाम पर धब्बा
खुद अपना लहु पीने वाला इंसान
खुदा का बन्दा हो न हो
शेतान का खिलोना ज़रूर है.

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