मंगलवार, 10 जुलाई 2012

एक बेचेन कविता


रोज ही
कुछ न कुछ
लिखता ज़रूर हूँ
परन्तु
यह लिखा वो नहीं जो
कोरे कागज पर
मासूम अहसास की  
पाकीजगी बन कर
उभरना चाहिए था.
चमन की खुशबु
खेतों में मिटटी की
सोंधी गंध
किसानो के गीत
फसलों की सरसराहट
के साज़ पर
नाचती मस्त हवा
सुहानी रातों में
मिलन के बाद
अलसाये हुए  
गुलाबी चेहरे के तप्त रंग
कलम को कब मिलते हैं.
हजार काट-छांट और
शब्दों के साथ
वहशियाना बलात्कार के बाद
अक्सर  
कागज फाड फेंकता हूँ
या बार बार दोहराता हूँ
गरीबी, भुखमरी, आंसूंओं के
बेरंग कसेले किस्से.  
भाग्यरेखा रहित हाथ
भीख के कटोरे उठाये हुए
फुथपाथों पर
रोते कुपोषित बच्चे
शहर में कुत्तों को
दूध मिलता होगा
बदनसीब मुफलिस इंसानों को
अकाल मरना होगा .
माना जवान होती रात में
आबाद हैं रंगीन महफिले
हंसी, मुस्कान, कहकहे.
मुझे नज़र आते हैं 
खून पसीना एक करने के बाद
दारु के अड्डे पर
झूमते हुए मजदूर.
बीमार, खांसती
लहू थूकती ओरतें जिन्हें
आसमान झांकती झुग्गियों में
दो रोटी जुगत की एवज
गाली, घूंसे खाने के बाद
शराब में डूबी
हवस का शिकार भी बनना है.
ओ सफलता की मिसालो
ओ सम्पन्नता के प्रतीकों
अच्छा है तुम लोग
काली खिड़कियों वाली
मोटरों में सफर कर
महलों के रेशमी पर्दों के पीछे
सोने चांदी की दुनिया में
मगन हो जाते हो. 
मैं भी नही देखना चाहता
इंसानी दुख के मंज़र
लेकिन उसके लिये शायद
इन आँखों को पथराना होगा.

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