अब ये शहर
रात को भी सोता नहीं.
आहटों का शोर
दरवाजों तक आकर
बिना दस्तक दिए
लोट जाता है.
किवाड खोल कर देखो तो
सामने सड़क पर
भागते हुए कदम
सिर्फ हादसे की आवाज़ पर
ठहरते हैं.
नींद का ऊँघता सफर
बेरंग लिफाफे की तरह
बेमंजिल जमा हो जाता है
सूरज के घर.
2 टिप्पणियां:
रफत साहब,
आपकी शायरी का एक-एक शब्द अपने आप में कुछ कहता हुआ सा होता है.
भावों की गहराई पाठक के भीतर तक बिना किसी मेहनत के सतत उतरती जाती है.और आपकी शायरी का यही वज़न बाकी के तमाम वजनों पर वज़नी पड़ जाता है.
आपके कलाम पर टिप्पणी की मेरी कतई हेसियत नहीं,लेकिन अपने अज़ीज़ के बारे में लिखे बिना भी नहीं रह सकता.
गलती के लिए क्षमा सहित--
सादर--
- अशोक पुनमिया.
जनाब अशोक साहिब आपकी टिप्पणी से कुछ और लिखने का होसला दिलाया है .हार्दिक धन्यवाद
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