बुधवार, 23 नवंबर 2011

फाकों की विरासत


रेशम के कीड़े का
मुक्कदर लेकर आने वालो
कब तक खुद में ही घुट कर
मरते रहोगे.
कबतक तुम्हारी रगों से खिंचा सोना
महाजन की दोलत बनता रहेगा
किसानों-मजदूरो कब तक
फाकों की विरासत बनते रहोगे.
क़र्ज़ में गिरवी खेत और हुनर
ब्याज में चुकतारा कर आने वालो
आत्महत्या के लिए 
ज़हर ढूँढते फिरोगे कबतक.    
कभी तो तुम भी
ज़हर का तोड़ ज़हर से करने की
हिम्मत करो
अत्याचार केवल डर की भाषा
समझता है
उठो, नागरूपी फुंकार भरो.
जाबेठो उन अकूत खजानो पर
जो दरअसल तिजोरिओं में बंद
लहू-पसीने से सिंच कर
लहलहाई वह फसल है
जिसके अंतिम वारिस तुम हो.
-रफत आलम -

     

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