बुधवार, 7 दिसंबर 2011

माटी का सफर


मुट्ठीभर माटी हूँ
मुझे खूब पता है.
आँख की किरकरी
बनने के बदले
क़दमों तले बिछने में
विश्वास करती है
यह माटी ताकि
रास्तों के काँटों से 
नंगे पाँव बच सकें
बगूलों की तरह
माहोल धूलीया जाने में
अपना नहीं भरोसा 
जो बस चले
प्यासों के मटकों हेतु
रोंधा जाना
या बच्चों के खिलोनों में
ढाला जाना पसंद करूँगा.
पर आजकल
बस्ती के नलके
खुद प्यासे हैं
पानी जहां है
‘पयूरिफायरों’ में से होकर
गुज़रता है.
बच्चे या तो
भीख के लिए हाथ पेलाये
बाप की दारु का साधन हैं 
या फिर टेडीबीयर से
खेलते है.
चाक और अलाव
गुज़रे वक्त की बातें बने
हुनरमंद हाथ जो  
ताजमहल के साथ ही
कटने शुरू होगए थे
मशीनों तले दब कर
सब मर गए हैं.
अभी तो
गुमशुदा सफर में हूँ
आगे तुम्हारी मर्ज़ी
चार काँधों पर उठाने वाले  
कहाँ अँधेरे गार में रखेंगे 
या फिर
आवारगी की
किसी मंजिल पर
चील-कोवे मुझे
निबटा रहे होगे
क्या ही पता? 

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