अच्छा इसी में है कम कहें
सुने कोन है जो हम कहें
तेरी ज़ात से जो अता हो
उस दर्द को केसे गम कहें
ज़ब्त की लाज इसी में है
ज़ख्मों को भी मरहम कहें
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तेरा यही इरादा है जिंदगी तो यूँ ही सही
अक्ल ओ होश न सही हमे जुनूं ही सही
तय हुआ चाहत के सफर में नहीं मिलेंगे
मर्ज़ी आपकी यही है तो चलो यूँ ही सही
चाह थी हम हँसते गाते जिंदगी जी जाते
अब मिले हैं मुकद्दर से तो आंसू ही
सही
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ठहराव बहुत ही मुख्तसर लिखा
उसने मेरे हिस्से में सफर लिखा
कलम ने ईमान से अगर लिखा
कोहीनूर का नाम पत्थर लिखा
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घरों
बसाने वालों ने बाग भी कई उजाड़े
काटे गए
दरख्तों पर घोंसले भी थे कई
बसावट की
आंधी में छप्पर ही नहीं उड़े
भूखे
प्यासे मरने वाले परिंदे भी थे कई
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