गुरुवार, 21 जून 2012

दिन बड़ा है आज


आज का दिन सचमुच बड़ा गुजर रहा है.सवेरे टहलने के बाद पार्क में ही बेठा रहा था.हवा की ठंडी सरसराहट पत्तियों को लहरा रही थी .फिर सूरज हरियाली को झुलसाने के लिए आ उतरा और मेने भी पसीने में नहाते हुए घर पहुँचने के बदले चल निकलने में भलाई समझी.सारी दोपहर खिडकी से धूप की किरने उतर कर  मेरी तन्हाई की भागीदार बनती रही.सच बात तो ये है मैं अक्सर भीड़ या महफ़िल में ही अकेला होता हूँ और दुनिया जिसे तन्हाई कहती है उस वक्त तो जाने कितने  गुज़रे कल मुझे बहला  रहे होते हैं या मैं उनसे बहल रहा होता हूँ . अब धूप  दीवारों से उतर रही है और सूरज थका सा सामने ऊँची इमारत के पीछे सरक गया है.मुझे बेठे बेठे किसी का शेर याद आया है

जाती है उजली धूप अपने पंख समेट कर
दिल के ज़ख्मों को गिनूंगा अब बिस्तर पे लेट कर

ये बड़ा सा दिन तो खेर गुजर सा गया है अब देखते है रात का क्या सामान हो .   

कोई टिप्पणी नहीं: