सपनों के चितेरे रह जाते है अँधेरों के संगी बन
कर
उजाला उसेही मिलता
है सूरज जिसकी निगाह में है
मंजिल की सोच करने से मंजिल मिला
नहीं करती
क़दमों में होसला रख के चल मंजिल तेरी
राह में है
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सुघड शरीर कुंदन जेसे सजे देखे
काल आया तो काठ पर पड़े देखे
अर्श से फर्श तक माटी का सफर
मुसाफिर ख़ाक हुए राख बने देखे
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कुछ खोते तो रोते
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जग की रीत निराली है
हर भरी बोतल खाली है
शाह फकीर एक जमात
सारा शहर ही सवाली है
उसकी रेखाएं पढ़े कोन
जिसकी मुट्ठी खाली है
कमीज़ सफेद खूब तेरी
बदन में आत्मा काली है
दिन कहीं लहू हुआ होगा
शाम के मुंह पे लाली है
रात की भी सोच आलम
पगले शाम होने वाली है
जमात-पंक्ति, सवाली-याचक
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