मंगलवार, 19 जून 2012


सपनों के चितेरे रह जाते है अँधेरों के संगी बन कर
उजाला उसेही मिलता है सूरज जिसकी निगाह में है
मंजिल की सोच करने से मंजिल मिला नहीं करती
क़दमों में होसला रख के चल मंजिल तेरी राह में है  
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सुघड शरीर कुंदन जेसे सजे देखे
काल आया तो काठ पर पड़े देखे
अर्श से फर्श तक माटी का सफर
मुसाफिर ख़ाक हुए राख बने देखे
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 कुछ पाते तो खोते
कुछ खोते तो रोते
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जग की रीत निराली है

हर भरी बोतल खाली है

शाह फकीर एक जमात

सारा शहर ही सवाली है

उसकी रेखाएं पढ़े कोन

जिसकी मुट्ठी खाली है

कमीज़ सफेद खूब तेरी

बदन में आत्मा काली है

दिन कहीं लहू हुआ होगा

शाम के मुंह पे लाली है

रात की भी सोच आलम 

पगले शाम होने वाली है 

जमात-पंक्ति, सवाली-याचक 


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