चिलचिलाती धूप में
भी कहीं नहीं ठहरे हम पागल लोग
सायों से दुश्मनी
पाल के घर से निकले हम पागल लोग
गम की जलन में सब
भाप हुए जो थे कुछ अपने आंसू
यूँ ही पथरा जायंगे
सूखे ठूठों को तकते हम पागल लोग
वाह रे जुनू लैला को
मजनू जाना मजनू को लैला माना
हुस्न तो हुस्न था
इश्क भी क्या समझे हम पागल लोग
तुम अपनी मंजिले
तलाशो हमें अपनी आवारगी अच्छी
यूँ ही ठिकाने जा
पहुंचेगे रुकते चलते हम पागल लोग
तुम पूछो नदियों से बड़े
समंदर से मिल के क्या लिया
अपनी ओकात में मीठे
रहे नन्हे कतरे हम पागल लोग
जाम देता नहीं साकी
और मांगने की हमको आदत नहीं
प्यास जब लगी
मरीचिकाओ से उलझे हम पागल लोग
कुछ ना मिलना ही दरअसल
सब कुछ पालेना है आलम
कुछ नहीं मिलने का
शिकवा नहीं करते हम पागल लोग
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