जो आँख की हद से गुजरा वो तो देख लिया
नजारा कहीं हसीन होगा जो मुझसे छुपा रहा
बहुत प्यास में मीठी
कुई को किया था याद
समंदर जाने क्यों
मेरे दरवाजे पर खड़ा रहा
इश्क में नहीं गुजरी तो कारे-हवस में बीती
तेरे बाद हुस्न से शर्मिंदगी का रिश्ता
रहा
उससे बिछड के मरे नही तो जिए भी क्या
रात हमें जलती मिली दिन अपना बुझा रहा
उसको चूमता रहा सारी
रात होठों में समेट
वो आंसू बन कर मेरी पलकों से झरता रहा
ठंडा एक अहसास
आंसू बन के बह ना सका
वो बरफ बन कर मेरी
पलकों में जमा रहा
जुदाई के मोड तक तो साथ था मगर फिर
ना उसकी खबर मिली ना अपना पता रहा
पाश मीराजी कीट्स गुलेरी सब जवान गए
आलम तू आशिक कहाँ था जो है बचा रहा
कारे-हवस-कामुकता
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