शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

शाम सवेरे के बीच


मयकदे से यक़ीनन मस्जिद ही जायगा
होश में आया नहीं है अभी तेरा दीवाना
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 आँगन की तुलसी के साये ढलती शाम के रंगों में सिमटकर गए
अब रात से पूछूगा मेहँदी रचे हाथों वाले घर छोड के किधर गए
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आकाश के छोर से चलती हुईं
गावों कस्बों शहरों गली-कूंचों
ताल-तलयया नदी समन्दरों पर से
धूप के सातों रंग समेट कर
उतर आ गयी है सुरमई शाम.
दिन के मंज़र
आँखों से गुजरने के बाद
गुज़रे पल हो गये हैं.
किन्ही दिलों के केनवासों  पर
कोई चटख तस्वीर ठहरी हो तो और बात,
वरना जिंदगियों के प्रिज़्म
अन्धेरा उतरने के बाद
कभी इंद्रधनुष नहीं बिखेरते.
सवेरे से फिर मुलाक़ात के लिए
वक्त को रात का सफर तय करना होगा
तब ही कहीं से आकर सूरज  
कलेंडर पर नई तारीख निहार पायगा.  

2 टिप्‍पणियां:

rafat ने कहा…

bahut shukriyaa mahendra sahib

rafat ने कहा…

behtreen sach likha hai shreeman isi ki naql shayad in taza panktiyon mein hoti hai
बेईमानी के इस गलीज़ दोर में ईमान की सनद रहे
जाली सिक्कों के बाज़ार में कुछ ही लोग नकद रहे
यही धुंधलका रहा तो मुस्तकबिल सियाह है आगे
लिख जाता हूँ तेरे लिए दोरेहाज़िर ताकि सनद रहे