शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

आदमी ही दोषी है क्या ?




पद, पदवी ,शोहरत ,धनाढ्यता,
लोकप्रीयता, चुम्बक हैं
अनुयाईयों रुपी लोहचूर्ण के लिए.
कोई महत्वाकांषा,  मतलब अथवा
अंधभक्ति की मानसिक दासता के
समर्पण काल में,
जिस्मपरस्तों के बीच शारीरिक संबंध होना
कोई निराली बात नही.
बिस्तर की सीढियां चढ कर
सफलता के शिखर पर बहुत पहुँचे हैं.
ये और बात है समय पुस्तक ने  
एसी महानता की कहानियाँ
अद्रश्य सियाही से लिखी है.  
यूँ तो बहुधा देखा है
भूली बिसरी हो जाती हैं
भावनाओं का उन्माद उतरने के पश्चात
बहक गए लम्हों की बाते.
शहनाइयों के बीच उठती डोलियां
गवाह हैं
केसे तेल, लूंन ,लकड़ी के चक्करों में
फँस के थम जाती हैं
अनगिनत जिंदगियो के बिंदास होसलों की उड़ाने. 
बदलते संबंधों के संक्रमण काल में  
नए दोर के लिवइन प्रेम किस्सों का
अंत भी देख रहे है  
कितने ही वर्षों कमरा सांझा करने के बाद
अंधे बहरे क़ानून का अजब इन्साफ होता है
देह शोषण का एक मात्र दोषी
ठहरा दिया जाता है बेचारा पुरुष.

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