गुरुवार, 16 अगस्त 2012


तेरी निगाह से उतर जाऊँगा
क्या जिऊँगा मैं मर जाऊँगा

तेरी निगाह में उतर जाऊँगा
दरपन देख के संवर जाऊँगा

साँसों के साथ गुजर जाऊँगा
लोट कर अपने घर जाऊँगा

डूबता सूरज डराता है किसे  
अंधेरे के पार गुजर जाऊँगा

चोराहे पर बेठा सोच रहा हूँ
उठ गया तो किधर जाऊँगा

अभी तो हूँ जिंदगी के साथ
क्या ही पता किधर जाऊँगा

अपने आपे का पता है मुझे
माटी हूँ कही बिखर जाऊँगा

ए आलम तू संभाल तो सही
लाख बिगडा हूँ सुधर जाऊँगा

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