ह्रदय में ढलता है कोन
श्वास को छलता है कोन
कहीं ये उजाला तो नहीं
बाति में जलता है कोन
साथ चलते तो हैं सभी
पर साथ चलता है कोन
तालियाँ को इससे क्या
हाथों को मलता है कोंन
कोई बड़ी चोट हुई होगी
यूँ भला पगलता है कोंन
आलम आस्तीन तो देख
विश्वास में पलता है कोन
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