शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

ज़ुल्म से लेकिन डरना केसा


२१ अगस्त को सवेरे मुझे यह अपना ब्लॉग ब्लोगर द्वारा हटा दिया गया मिला.गूगल का एकाउंट भी जाने क्यों ब्लाक हो गया.गूगल से जानकारी लेने पर गोलमोल तरीके से संदेहात्मक कारणों के चलते अकाउंट पर रोक लगाई बताई गयी.कारण तो अब तक भी पता नहीं परन्तु शुक्र है अनुरोध करने पर मेरा अकाउंट मुझे वापस मिल गया है.अब मित्रों मैं यू टयूब पर वीडियो अपलोड कर सकता हूँ और आपसे भी दो बातें दिल की कर सकता हूँ यानी अपने दोनों ब्लॉग आपरेट करके  
आपकी सेवा में हाज़िर हो सकता हूँ.पिछले दोनों दिनों जिस कविता ने मुझे बहुत सकून दिया वह अली सरदार जाफरी ने पकिस्तान के पाषाण हुकमरानों द्वारा फैज़ अहमद फैज़ को जेल भेज देने पर लिखी गयी थी.१२४ पंक्तियों की कविता में से निम्नलिखित मुझे अधिक हिम्मत दी. अंतत ब्लोगर और गूगल का शुक्रिया जो उन्होंने मुझे राहत दे दी है .मैं अपने उस अद्रश्य दुसमन को भी दुआ देता हूँ जिसने किन्ही कारणों से मेरा अकाउंट हेक कर लिया था .उसे भारी निराशा हुई होगी ...चंद तस्वीरे बुताँ चंद हसीनो के खुतूत ..ग़ालिब साहब के इस अदना चेले  की कुटीया से और क्या मिलना था.खेर तो कविता का आनंद लिया जाए 

 ..ज़ुल्म से लेकिन डरना केसा
  
मोत से पहले मरना  केसा

बोल के लब आज़ाद हैं तेरे

बोल जबां अब तक तेरी है

बोल के किस कातिल का दामन

खूने बहारां से रंगी है

किसकी गर्दन में डालर के

साने जंजीर पड़ी है

किसने अमरीका के हाथो

खाके वतन को बेच दिया है

बेटी और बहन के आँचल

मां के  कफ़न को बेच दिया है ......अली सरदार जाफरी   

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