वही हैं मेरी पलकें
राह में बिछी हुई
इन्तेज़ार की
बेचेनियों का अंदाज़ वही है
वही जलती है धमनियों
में चाहत की आग
जिसकी तपिश में हम
पिघल कर
चांदनी के तलिस्म
में सिमट जाया करते थे
कुछ भी तो नहीं बदला
सिवा तुम्हारी राह के
जो अब मेरे घर के
रास्ते से नहीं गुजरती.
मेरी दोस्त!
तुम फूलों की वादी
के सफर में हो तो अच्छा
खुदा करे खुशबु बन
कर महका करो
और अगर वही है धूप
भरी ज़िदगी की डगर
लोट जाओ चले आओ
वही हैं मेरी पलकें
राह में बिछी हुई.
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