शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

शाम सवेरे के बीच


मयकदे से यक़ीनन मस्जिद ही जायगा
होश में आया नहीं है अभी तेरा दीवाना
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 आँगन की तुलसी के साये ढलती शाम के रंगों में सिमटकर गए
अब रात से पूछूगा मेहँदी रचे हाथों वाले घर छोड के किधर गए
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आकाश के छोर से चलती हुईं
गावों कस्बों शहरों गली-कूंचों
ताल-तलयया नदी समन्दरों पर से
धूप के सातों रंग समेट कर
उतर आ गयी है सुरमई शाम.
दिन के मंज़र
आँखों से गुजरने के बाद
गुज़रे पल हो गये हैं.
किन्ही दिलों के केनवासों  पर
कोई चटख तस्वीर ठहरी हो तो और बात,
वरना जिंदगियों के प्रिज़्म
अन्धेरा उतरने के बाद
कभी इंद्रधनुष नहीं बिखेरते.
सवेरे से फिर मुलाक़ात के लिए
वक्त को रात का सफर तय करना होगा
तब ही कहीं से आकर सूरज  
कलेंडर पर नई तारीख निहार पायगा.  

आयगी नहीं वह


वही हैं मेरी पलकें राह में बिछी हुई

इन्तेज़ार की बेचेनियों का अंदाज़ वही है

वही जलती है धमनियों में चाहत की आग

जिसकी तपिश में हम पिघल कर

चांदनी के तलिस्म में सिमट जाया करते थे

कुछ भी तो नहीं बदला सिवा तुम्हारी राह के

जो अब मेरे घर के रास्ते से नहीं गुजरती.

मेरी दोस्त!

तुम फूलों की वादी के सफर में हो तो अच्छा

खुदा करे खुशबु बन कर महका करो

और अगर वही है धूप भरी ज़िदगी की डगर

लोट जाओ चले आओ

वही हैं मेरी पलकें राह में बिछी हुई.

ज़ुल्म से लेकिन डरना केसा


२१ अगस्त को सवेरे मुझे यह अपना ब्लॉग ब्लोगर द्वारा हटा दिया गया मिला.गूगल का एकाउंट भी जाने क्यों ब्लाक हो गया.गूगल से जानकारी लेने पर गोलमोल तरीके से संदेहात्मक कारणों के चलते अकाउंट पर रोक लगाई बताई गयी.कारण तो अब तक भी पता नहीं परन्तु शुक्र है अनुरोध करने पर मेरा अकाउंट मुझे वापस मिल गया है.अब मित्रों मैं यू टयूब पर वीडियो अपलोड कर सकता हूँ और आपसे भी दो बातें दिल की कर सकता हूँ यानी अपने दोनों ब्लॉग आपरेट करके  
आपकी सेवा में हाज़िर हो सकता हूँ.पिछले दोनों दिनों जिस कविता ने मुझे बहुत सकून दिया वह अली सरदार जाफरी ने पकिस्तान के पाषाण हुकमरानों द्वारा फैज़ अहमद फैज़ को जेल भेज देने पर लिखी गयी थी.१२४ पंक्तियों की कविता में से निम्नलिखित मुझे अधिक हिम्मत दी. अंतत ब्लोगर और गूगल का शुक्रिया जो उन्होंने मुझे राहत दे दी है .मैं अपने उस अद्रश्य दुसमन को भी दुआ देता हूँ जिसने किन्ही कारणों से मेरा अकाउंट हेक कर लिया था .उसे भारी निराशा हुई होगी ...चंद तस्वीरे बुताँ चंद हसीनो के खुतूत ..ग़ालिब साहब के इस अदना चेले  की कुटीया से और क्या मिलना था.खेर तो कविता का आनंद लिया जाए 

 ..ज़ुल्म से लेकिन डरना केसा
  
मोत से पहले मरना  केसा

बोल के लब आज़ाद हैं तेरे

बोल जबां अब तक तेरी है

बोल के किस कातिल का दामन

खूने बहारां से रंगी है

किसकी गर्दन में डालर के

साने जंजीर पड़ी है

किसने अमरीका के हाथो

खाके वतन को बेच दिया है

बेटी और बहन के आँचल

मां के  कफ़न को बेच दिया है ......अली सरदार जाफरी   

सोमवार, 20 अगस्त 2012


कुछ लोगों के मन


बच्चे की जिद जेसे होते हैं 


आँखों के चुम्बक से खींच कर 


ख़ूबसूरत खिलोने ला बिठाते हैं


धडकन के घर में .


खेलते हैं कुछ देर गुडिया गुड्डा


फिर खिलोने तोड़ कर


रोने लगते हैं.

सफलता की कीमत


जीवन की दोड में 

हर कोई आसमान छूना चाहता है 

अपनी सीढियां साथ लिए

भागे चले जा रहे हैं लोग 

पायदाने चढते हुए 

गिरते गिराते टकराते हुए .

धरती पर पड़े रह गए 

खुशनसीब है 

हंस बोल लेते हैं 

दुख सुख बाँट लेते हैं परन्तु ,

सीढ़ी की आखिरी पायदान पर खडा

अंतिम व्यक्ति नितांत अकेला होता है

इश्वर की तरह .

प्रहरियों से घिरे विशिस्ट-जनो को देख कर

यही सबक मिलता है  

सफलता की कीमत हमेशा

निज स्वतन्त्रता खोकर चुकानी पड़ती है.

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

अन्नाबाबा -राम बाबा के नाम




मेने तुझको सचमुच कभी

मसीहा ही समझा था.

मुझको मालूम क्या था

पहले मसीहा को चेले ने छला था

अब मसीहा चेलो को छलेगा.

ईमान की खुशबु से

चमन महकाने के नशे में

मेने तेरा खेल समझा कब.
   
न सलीब न कीलें न बहता लहू

उस पर तुर्रा राज करने की आरजू

गलती मेरी ही थी

झोले छाप को डाक्टर मान बेठा

इलाज में आँखे फूटनी ही थी

घाव बढ़ना ही था.



......
मेने तुझको सचमुच कभी

बाबा ही समझा था

तेरे नाम पर घंटो सांसे अपनी

उपर नीचे की थी.

पर गुरु तू गुरुघंटाल निकला

काला धन मिले न मिले

सिंगासन चालीसा गाकर

हाथवालों की सत्ता तिजोरी

हड़पना ज़रूर है. 

सर्प दूर करने के लिए चाहे

कीचड के कमल माथे बिठाने पड़ें.

ज़ालिम तुझसे मोहभंग होकर

उफ़ !मेरा बी.पी. बढ़ गया है.

भ्रस्ताचार पर अंकुश की

न काले धन की परवाह

रंगी खाल ओढ़े शेरो का

जलवा फीका पड़ने लगा है.

भोली आँखों को असल बहरूप

नज़र आने लगा है यानी.

फिर हमारे कातिल आये हैं

मसीहा बनकर. 

तेरी निगाह से उतर जाऊँगा
क्या जिऊँगा मैं मर जाऊँगा

तेरी निगाह में उतर जाऊँगा
दरपन देख के संवर जाऊँगा

साँसों के साथ गुजर जाऊँगा
लोट कर अपने घर जाऊँगा

डूबता सूरज डराता है किसे  
अंधेरे के पार गुजर जाऊँगा

चोराहे पर बेठा सोच रहा हूँ
उठ गया तो किधर जाऊँगा

अभी तो हूँ जिंदगी के साथ
क्या ही पता किधर जाऊँगा

अपने आपे का पता है मुझे
माटी हूँ कही बिखर जाऊँगा

ए आलम तू संभाल तो सही
लाख बिगडा हूँ सुधर जाऊँगा

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012


ह्रदय में ढलता है कोन  
श्वास को छलता है कोन

कहीं ये उजाला तो नहीं
बाति में जलता है कोन  
  
साथ चलते तो हैं सभी
पर साथ चलता है कोन 

तालियाँ को इससे क्या
हाथों को मलता है कोंन

कोई बड़ी चोट हुई होगी 
यूँ भला पगलता है कोंन 

आलम आस्तीन तो देख
विश्वास में पलता है कोन

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

आदमी ही दोषी है क्या ?




पद, पदवी ,शोहरत ,धनाढ्यता,
लोकप्रीयता, चुम्बक हैं
अनुयाईयों रुपी लोहचूर्ण के लिए.
कोई महत्वाकांषा,  मतलब अथवा
अंधभक्ति की मानसिक दासता के
समर्पण काल में,
जिस्मपरस्तों के बीच शारीरिक संबंध होना
कोई निराली बात नही.
बिस्तर की सीढियां चढ कर
सफलता के शिखर पर बहुत पहुँचे हैं.
ये और बात है समय पुस्तक ने  
एसी महानता की कहानियाँ
अद्रश्य सियाही से लिखी है.  
यूँ तो बहुधा देखा है
भूली बिसरी हो जाती हैं
भावनाओं का उन्माद उतरने के पश्चात
बहक गए लम्हों की बाते.
शहनाइयों के बीच उठती डोलियां
गवाह हैं
केसे तेल, लूंन ,लकड़ी के चक्करों में
फँस के थम जाती हैं
अनगिनत जिंदगियो के बिंदास होसलों की उड़ाने. 
बदलते संबंधों के संक्रमण काल में  
नए दोर के लिवइन प्रेम किस्सों का
अंत भी देख रहे है  
कितने ही वर्षों कमरा सांझा करने के बाद
अंधे बहरे क़ानून का अजब इन्साफ होता है
देह शोषण का एक मात्र दोषी
ठहरा दिया जाता है बेचारा पुरुष.