मयकदे से यक़ीनन
मस्जिद ही जायगा
होश में आया नहीं है
अभी तेरा दीवाना
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अब रात से पूछूगा
मेहँदी रचे हाथों वाले घर छोड के किधर गए
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आकाश के छोर से चलती हुईं
गावों कस्बों शहरों
गली-कूंचों
ताल-तलयया नदी
समन्दरों पर से
धूप के सातों रंग
समेट कर
उतर आ गयी है सुरमई
शाम.
दिन के मंज़र
आँखों से गुजरने के
बाद
गुज़रे पल हो गये हैं.
किन्ही दिलों के
केनवासों पर
कोई चटख तस्वीर ठहरी
हो तो और बात,
वरना जिंदगियों के प्रिज़्म
अन्धेरा उतरने के
बाद
कभी इंद्रधनुष नहीं बिखेरते.
सवेरे से फिर
मुलाक़ात के लिए
वक्त को रात का सफर
तय करना होगा
तब ही कहीं से आकर सूरज
कलेंडर पर नई तारीख
निहार पायगा.