सोमवार, 23 जुलाई 2012


जी चाहता है
सारी दुनिया के आंसू पोंछ दूं .
सबका दर्द
मुस्कानों को सोंप दूं.
धुंआ से बेहाल माहोल की घुटन में
खुशबु भरे फूल रोप दूं .
पर मेरी खुद की आँखों में
आसू भरे हैं.
कटते दरख्तों के मंज़र
धुन्धलाये हुए है.
कारखाने ज़हर उगल रहे हैं.
खाप पंचायतों के सामने
फिर संगसार हैं लेला मजनू.
आह ! फूटपाथ पर
सोते बेघरों को कुचल गयी
रईसजादे की कार.
अनगिनत कन्या भूर्ण
नाले कीचड की गति
पा गए मुक्ति.
सफेद पानी हुआ लहू
रिश्ते सब सवार निकले
कागजी नावों के
.
ये नाम के प्रगति पथ
घोटाले घूसखोरी बेईमानी
लक्ष जीवनों के,
अब कहाँ हैं अग्नि पथ.
वो देख बाग को खा गयी बाड
ओ सोये हुए अंधे क़ानून जाग
सबकी आँखों में आसू भरे हैं
मेरा बहुत जी चाहता है
सारी दुनिया के आंसू पोछ दूं

फटे हाल बच्चे





चोराहे की बत्तियों पर

मेले कपडे के टुकड़े से

चमकीली कारों के शीशे

साफ़ करने की झूंठी कवायद में

हरे, लाल रंगों के बदलाव के साथ

ज़ेबराक्रास पर नाचते रहते हैं.

गाळीयों और दुत्कारो के सिवा

भूले बिसरे

फेंकी गयी चिल्लर  बीनते

नाज़ुक हाथों के लिए

एक सो रुपये का नोट उठाना

सबसे बड़ा सपना होगा शायद.

ये और बात है

रोटी के सूखे टुकड़े की एवज

दिन भर समेटी गयी ज़िल्लत

नन्ही मुट्ठियों से छीनकर 

शराब की दुकान के गल्ले में

जमा करा आते हैं

भीख के ठेकेदार. 

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

कल बहुत दरख्त थे



  (एक बात)

तुम्हे अपने गावं गए
कितने वर्ष या दिन गुजरें हैं,
कई साल हो गये अगर
अपनी ज़मीन से लोटे
तो समझो
तुम्हारी जड़ें कब की कट गयी होंगी
अगलों की निशानी खेतों पर
भूमाफियाओं के मकडजाल
बेतरतीब कालोनियों का
कनछलानुमा केंसर बसा चुके होंगे.
हुक्का गुडगुड़ाते थे नीम की जिस घनी
छाव तले पुरखे
बेरहम कुल्हाड़े की धार से कट कर
धम से गिर पड़ा होगा
अपने बेरहम वासियों की दरिंदगी पर
धरती ज़रूर हिली होगी
किसने तब
हरियाली का दर्द महसूस किया होगा

(दूसरी बात)

कई दिन ही हुए है अगर
अपनी ज़मीन से आपको लोटे
तो ध्यान करो
बस स्टेंड के रास्ते पर खडा
लेहस्वों का बड़ा पेड देखा ?
जिसपर लाल चोंच वाले सुंदर तोते
गोंद भरे मीठे रस का
स्वाद लिया करते थे
क्या कहा नहीं देखा
तुमने कोई दरख्त नहीं देखा
तो फिर ज़रूर
गाव की सडक चोडी हो गयी होगी 

(तीसरी बात )


नंगे पहाड
बंजर धरती
प्यासे खेत
आत्महत्या करते किसान
जिंदगी तेरे होने का क्या
अर्थ है यही 
कंक्रीट के दडबो में केद जिंदगी
तुझे पता भी है
कब सुबह की शीतल पवन चली
अब शाम ने सिन्दूर भर के
रात के बिस्तर पे कदम रखा
एक अदना सोच है यह
अपने मतलबों के सिवा
आदमी को
अपनी दुनिया से कोई सरोकार नहीं.
............
यहाँ किसे परवाह है बस्ती के जलते हुए घरों  की
सब अपने छप्परों की तरफ पानी लिए दोड रहे हैं.
       




सही ही होंगे तुम्हारे शिकवों के जो सिलसिले हैं
एक दिल फिर भी कब बोला उसके भी गिले हैं

हमसे कोई दिलवाला नहीं मिला ये और है बात
हम जिससे भी मिले है दिल खोल कर मिले हैं 

लुटने जेसी कोई चीज़ नहीं यहाँ फिर डर केसा
बेफ़िक्र चले आओ इस दिल के किवाड खुले हैं

दुनिया कहती है बिकना है तो बाजार में आना  
किसने जाकर देखे फूल जो वीरानो में खिले हैं

दीवानगी ओ दीवानगी तेरी संभाल का शुक्रिया
बिछड़े गए कुछ अक्ल वाले खुद से आ मिले हैं

यूँ ही नहीं आया दर्द सहने का अंदाज़ आलम
कई गरेबां चाक किये तो अपने ज़ख्म सिले हैं

चाक-फाड़े (अर्थ पागल होने से है )

नहीं कुछ भी नहीं


इस खामोशी को बना रहने दो, मेरे पास 
अब कुछ भी नहीं है कहने को, मेरे पास

उजाला रक्स में है कहीं तेरी महफ़िल में
रह गयी शमा की थरथराती लो, मेरे पास

तुम्हे छीन ले जाने वाला वक्त क्या जाने
तुम रूह की रौशनी बन कर हो ,मेरे पास

रात जवान है रूठने वाले क्या भला होगा
अब गुस्सा थूक भी यार आ सो, मेरे पास

जेबें खाली सही दिल का अमीर हूँ आलम  
बोलो लोगे दुख की दोलत है जो, मेरे पास

रक्स-नाच, लो-शिखा 

शनिवार, 14 जुलाई 2012

सांसों का दिशाहीन सफर


साँसों के दिशाहीन सफर में
मंजिले समझ कर
जर, जोरू और ज़मीन के लिए
सदा ही ताकतवर
कमजोर के साथ
बलात्कार करता रहा है. 
कभी मजहब के नाम पर
कभी अधिकार के नाम पर
कभी इन्साफ के नाम पर
अनगिनत बहानो से
तलवारों की नोकों ने
इतिहास के पन्ने
रक्तरंजित किये हैं.
खंडहर बने
महल दुर्ग किले गवाह है
आदमी ने
साँसों के दिशाहीन सफर में
अपने अंजाम की कब खबर रखी
सामान सो बरस का पल की खबर नहीं
कहने वाले को कहाँ ख्याल है
जिंदगी की शाम में
कभी सुबह नहीं होती.
गुलामी की जंजीरों से
कंटीली सरहदों से
बड़े कातिल बमों से
धरती की छाती को
छलनी करने वाला
मानवता के नाम पर धब्बा
खुद अपना लहु पीने वाला इंसान
खुदा का बन्दा हो न हो
शेतान का खिलोना ज़रूर है.

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

एक बेचेन कविता


रोज ही
कुछ न कुछ
लिखता ज़रूर हूँ
परन्तु
यह लिखा वो नहीं जो
कोरे कागज पर
मासूम अहसास की  
पाकीजगी बन कर
उभरना चाहिए था.
चमन की खुशबु
खेतों में मिटटी की
सोंधी गंध
किसानो के गीत
फसलों की सरसराहट
के साज़ पर
नाचती मस्त हवा
सुहानी रातों में
मिलन के बाद
अलसाये हुए  
गुलाबी चेहरे के तप्त रंग
कलम को कब मिलते हैं.
हजार काट-छांट और
शब्दों के साथ
वहशियाना बलात्कार के बाद
अक्सर  
कागज फाड फेंकता हूँ
या बार बार दोहराता हूँ
गरीबी, भुखमरी, आंसूंओं के
बेरंग कसेले किस्से.  
भाग्यरेखा रहित हाथ
भीख के कटोरे उठाये हुए
फुथपाथों पर
रोते कुपोषित बच्चे
शहर में कुत्तों को
दूध मिलता होगा
बदनसीब मुफलिस इंसानों को
अकाल मरना होगा .
माना जवान होती रात में
आबाद हैं रंगीन महफिले
हंसी, मुस्कान, कहकहे.
मुझे नज़र आते हैं 
खून पसीना एक करने के बाद
दारु के अड्डे पर
झूमते हुए मजदूर.
बीमार, खांसती
लहू थूकती ओरतें जिन्हें
आसमान झांकती झुग्गियों में
दो रोटी जुगत की एवज
गाली, घूंसे खाने के बाद
शराब में डूबी
हवस का शिकार भी बनना है.
ओ सफलता की मिसालो
ओ सम्पन्नता के प्रतीकों
अच्छा है तुम लोग
काली खिड़कियों वाली
मोटरों में सफर कर
महलों के रेशमी पर्दों के पीछे
सोने चांदी की दुनिया में
मगन हो जाते हो. 
मैं भी नही देखना चाहता
इंसानी दुख के मंज़र
लेकिन उसके लिये शायद
इन आँखों को पथराना होगा.

बुधवार, 4 जुलाई 2012

बोसान


न था कुछ तो खुदा था, कुछ ना होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने,  ना  होता  मैं  तो क्या  होता

हज़रत ग़ालिब ने ये शेर कोई डेढ़ सदी पहले कहा था और मुझे आज सवेरे अखबार पढते वक्त अचानक याद आया जब गाड पारटीकल की खबर ने साबित किया गाड था है और सदा रहेगा.अजीब बात यह लगी कि गाड पारटीकल को तो वेज्ञानिकों ने मान लिया सारे मीडिया में उसी का चर्चा है पर गाड के होने न होने की बहस खामोश सी है जेसे सदियों से आपस उलझते आस्तिक  नास्तिक थक गए हों.भाई हम एशिया वाले तो सदा से कहते रहे हैं कण कण में खुदा/भगवान/वाहेगुरु या गाड जो भी कहो मोजूद है पर दिखाई नहीं देता .वह अजर अमर है उसका कोई आरम्भ या अंत नहीं है. वह निराकार है आदि आदि.अब २७ मील लंबी गुफा में बहुत कुछ या कहो प्रोटोन युद्ध करा कोई कण देखे है पश्चिम  के वेज्ञानिकों ने चाहे इस खोज पर भी मूल विचार भारत के ही बासु साहिब का था जो बोसान बन गया.ये और बात है कोई गोरा होता तो अपनी खोज पर नोबल इनाम ले उड़ता. नंगे फ़कीर के देश वाले को दिमाग को इज्ज़त कोन दे .नाम को तो गाड पारटीकल की खोज में कोई १११ देशों के बंदे शामिल थे जिनकी इबादत /मेंहनत का असल फल जाने किन्होने चखा .ख्याल तो यह है कि  जेसा सदा से होता आया है आम चूसने वाले तो कोई और ही रहेंगे फेंके छिलकों से जिन्हें बहलना है ज़रूर बहलें.

कहा यह जा रहा है ये होगा वो होगा दुनिया के प्रगति पथ पर क्रान्ति आ जायगी जेसे गाड पारटीकल धरती पर स्वर्ग उतार लाएंगे.अजर अमर होकर आदमी चाँद तारों पर जाके बादशाहत करेगा.चलो जो भी हो सही हो पर इस निराशावादी मन में जाने क्यों ख्याल आ रहा है.वह काला विचार यह है कि आणुविक शक्ति और अपने मारक हथियारों  के बल पर यूनी पोलार विश्व व्यवस्था का सपना देखने और उसे साकार करने में लगे महाबली इस नए अजूबे से कही सचमुच खुदाई का दावा न करने लगें. 

दिशाहीन ...


चींटियों के लिए अब तिनके के सहारे भी कहाँ
बन्दर तो हुए पार जिराफों की गर्दन पकड़ कर

कटी पतंग की तरह दिशाहीन हुए फिर रहे हो
बताओ क्या पाया वक्त की हवाओं से लड़ कर

अपने सामने से जाने पर अब शिकवा है केसा
तुमने क्यों नहीं उठाया था जाम आगे बढ़ कर

जलते घरों के धुए में सिमट कर रह गए लोग
बहुत उजाले की सोचते थे ओकात से बढ़ कर

लहरे आज भी आकर उसका ठिकाना पूछती हैं  
जाने कोन नाव गयी थी किनारे से बिछड कर
.............................
अपने पते जा पहुचे लिफाफे जो बा-टिकट गए
कुछ खत कोरे रह गए खामोशी में सिमट कर