जी चाहता है
सारी दुनिया के आंसू पोंछ दूं .
सबका दर्द
मुस्कानों को सोंप दूं.
धुंआ से बेहाल माहोल की घुटन में
खुशबु भरे फूल रोप दूं .
पर मेरी खुद की आँखों में
आसू भरे हैं.
कटते दरख्तों के मंज़र
धुन्धलाये हुए है.
कारखाने ज़हर उगल रहे हैं.
खाप पंचायतों के सामने
फिर संगसार हैं लेला मजनू.
आह ! फूटपाथ पर
सोते बेघरों को कुचल गयी
रईसजादे की कार.
अनगिनत कन्या भूर्ण
नाले कीचड की गति
पा गए मुक्ति.
सफेद पानी हुआ
लहू
रिश्ते सब सवार निकले
कागजी नावों के
.
ये नाम के प्रगति पथ
घोटाले घूसखोरी बेईमानी
लक्ष जीवनों के,
अब कहाँ हैं अग्नि पथ.
वो देख बाग को खा गयी बाड
ओ सोये हुए अंधे क़ानून जाग
सबकी आँखों में आसू भरे हैं
मेरा बहुत जी चाहता है
सारी दुनिया के आंसू पोछ दूं