बुधवार, 26 दिसंबर 2012

सदमे भूलना आसान कहाँ ऐ दिल


हवसकार बन्दों को मुहब्बतों से सरोकार नहीं रहा
बेगेरत बसते हैं अब इस बस्ती में प्यार नही रहा

दीवारों से गुफ्तगू करके घर की खामोशी सो गयी
दरवाज़े को भी किसी आहट का इन्तेज़ार नहीं रहा

ऊँगली पकड के चलना जिनको हमने सिखाया था
अब उनको हमारे रास्तों से कोई सरोकार नहीं रहा

जिंदगी की हर साँस उसी के नाम है ये और बात  
लबों पर खामोशी कहती है मैं उसे पुकार नहीं रहा

दुनिया से रूठ कर अपने ही अंदर जा खोया हूँ मैं
अब किसी के रहमओकरम का गुनाहगार नहीं रहा

खोये हुओं पर भरोसा करना वेसे भी फ़िज़ूल होता
अच्छा हुआ जो दोस्त तुझे मुझपे ऐतबार नहीं रहा

मैं तो खुद को भुला के एक पल में उसे भूल गया
सुना है वो भी मेरे गम में बहुत सोगवार नहीं रहा

ले दे के खुशबू थी जिसे भी चमन की हवा ले उडी
मोसमे बहार पर कभी फूलों का इख्तियार नहीं रहा

कोई तो साबित करो इस बस्ती में आदमी रहता है
आदमी की दरिंदगी से आदमी पर एतबार नहीं रहा

लाश बोलती नहीं और गवाहों को जान का था डर  
कातिल भी हाथ धोके खून का जिम्मेवार नहीं रहा

दरिंदे खुले में नोचते फिर रहे है आदमी को आलम
जेसे इस बस्ती पर अल्लाह का इख्तियार नहीं रहा 

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

मिला कुछ नहीं .


मैं सुनहरे कल के लिए जान कुर्बान कर दूगा मगर
मसीहा बनने वाले तू अपने साथ सलीब लाया क्या ?
तमाम इन्कलाब आखिर महलों के हिमायती निकले
कोई बताओ फुटपाथ ने ठोकरों के सिवा पाया क्या ?

सतयुग तक में यीशु को पाकदामन एक वेश्या ही मिली
आज हर कोई ईमान की दुहाई दे रहा है, बड़ा मजाक है
हम्माम के सब नंगे जेसे काजल की कोटरी से निकले हैं
फिर भी दाढ़ी में तिनका दिखाई दे रहा है, बड़ा मजाक है

जिसके पास गुजरबसर से ज्यादा है वो तुम्हारा है
भीख के लिए फेले हुए हाथो छीनने कब निकलोगे
सोने भरी कमजर्फ तिजोरियां यूँ नहीं खुलने वाली
टूटेंगे खजानो के ताले भी साथ जब सब निकलोगे

भीड़ को इक्कठा करने के लिए कोई शोर है ज़रूरी
ईमान का ढोल लेकर निकलने वाले खूब जानते हैं
पतंगे होती ही कटने, काटने, लूटने, फाड़ने के लिए
खेंच-ढील के दाव में माहिर हवा के रुख पहचानते हैं 

सोमवार, 19 नवंबर 2012

तू ही तू है


तमाम दरख्त कलम बन कर लिखते हैं
उसके होने की गवाही समंदर लिखते हैं

लहू के कतरों से उसकी ही हम्दो सना
अहले जनून सूलियों के उपर लिखते हैं

रूप जिसका कोई नहीं सबसे है रूपवान
बखान उसी के रस में डूबकर लिखते हैं

उसके बेशक्ल होने की सनद है कायनात 
उसी की शान प्रेमी पत्थर पर लिखते हैं

किरणों को कलम बना कर उसकी स्तुर्ती
अपने उजाले में शम्सओकमर लिखते हैं

तुम हो अव्वल ता आखिर तुम्हारा जिक्र
गुलुकार गा रहे हैं जो सुखनवर लिखते है

किसने कहा ग्यानी हैं हम पागल आलम
प्यार की तलाश में ढाई अक्षर लिखते है

दरख्त-पेड , हम्दो सना-स्तुर्ती , अहले जनून-अभिशिप्त लोग
(प्रेम में),कायनात-स्रटी, शम्सओकमर-चाँद–सूरज, अव्वल ता आखिर-
आरम्भ से अंत तक ,गुलुकार-गायक , सुखनवर-कवि
.......

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

एक भेड़ की व्याथा


मैं जनता हूँ
वह भीड़ या कहो भेड
जिसे हर समय खंड में
सत्ता सुख तलाशते कसाइयों ने
क्रान्ति का शहीदी जामा पहना कर
सडक पर लाकर
संवेदनाओं की उलटी छुरी से
बलि किया है.
कोई बताए किस आंदोलन ने धरती पर
स्वर्ग उतारा है.
वही है कमज़ोर त्रस्त-पस्त जो कि था
वही है ताकतवर ज़बरदस्त जो कि था.
फिर भी आज अगर तुम लोग
ईमान का आकाश छूने बात कर रहे हो
ओ! ज़बानी उन्माद से पागल करने वालो  
ये तो बताओ मैं केसे
उस ज़मीन पर उतरूंगा कि जहां
लेनदेन के घूसखोर दोर की कमाई से अटे
हम सभी के गोपनीय लाकरों की चाभियाँ छिपी है
अंतरात्मा की आवाज़ पर सबसे पहले
मसीहा से बीमार तक आओ
अपने खजाने खोलो
फिर किसी आंदोलन की ज़रूरत नहीं होगी
पर क्या ऐसा होगा
सत्ता सुख तलाशने वालो ! 

सोमवार, 5 नवंबर 2012

जिंदगी के सफर में...


जिंदगी तेरे सफर में
लाल कालीनों पर चल कर
चाँद तारे पकड़ने को आतुर हैं लोग.  
भ्रस्टाचार की खाद बिखेरती
हीरे पन्ने जड़ी अंगुठियां
स्वर्ण वर्क्षों की फसलें खड़ी कर रही हैं.
सोने चांदी रत्नों के खजाने
तिजोरियों के अन्धकार को सुपर्द करने वालो    
ये सरमाया नंगी भूखी जनता के लिए 
रोटी कपड़ा और मकान का साधन बन सकता था
वक्त की सियाह कब्रों में दफीना बना जा रहा है
आखिर किस काम का है.
नींद की गोलियों के खाली रेपर हैं गवाह
मीडासों  के सकून का हिसाब
रेशमी चादरों पर करवटों में लिखा है.   
जिंदगी तेरे सफर में
पसीने की नदी के गोते खा कर
कोडियों की तलाश में हैं लोग
जो भी अक्सर उनकी पकड़ से दूर हैं.
दिन भर कमर तोड मजदूरी से
पीठ से चिपका हुआ भूखा पेट
दुखने लगता है.
कुदाल फावड़े अपना उधार चुक लेते है
मेहनतकश हाथों के छाले
बुझे चूल्हों पर पक कर सो जाते हैं.
जिंदगी तेरे सफर में
चमक दमक की खुद्फरेबी से लाख बहला करे कोई 
दोलत की चकाचोंध  से चुंधियाई आंखों को
नींद मयस्सर नहीं है.   
नाग बन कर खजानो पर बेठे निर्मम लोगो  
तुम्हे भूत बनने तक जागते रहना होगा.

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

चालीसवा तबादला



अभी बहुत अधिक समय नहीं हुआ एक सरकारी कारिंदे ने

ईमानदार होने की सज़ा अपनी जान से हाथ धो कर पायी थी 

फिर भी कीचड में कमलों ने खिलना नहीं छोड़ा.

यह सही है प्यादों ने फरजी बन कर 

ईमान के सूरज को गिरवी रख लिया है

बंदरबाट खा रही है किरण किरण उजाला. 

हताश करते इस निराशामय अन्धकार में 

तबादलों/गालियों/गोलियों की सज़ा से बेपरवाह

अपना घर जला कर रौशनी का इंतज़ाम करने वाले 

बाकी हैं अभी

ताकि चोपट राज में खून से लिखी तहरीरें गवाही दें 

कि भ्रस्ट कालखंड में भी कुछ लोग ईमान की सनद रहे.

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012


अच्छा इसी में है कम कहें
सुने कोन है जो हम कहें

तेरी ज़ात से जो अता हो
उस दर्द को केसे गम कहें

ज़ब्त की लाज इसी में है  
ज़ख्मों को भी मरहम कहें 

............
तेरा यही इरादा है जिंदगी तो यूँ ही सही
अक्ल ओ होश न सही हमे जुनूं ही सही

तय हुआ चाहत के सफर में नहीं मिलेंगे
मर्ज़ी आपकी यही है तो चलो यूँ ही सही

चाह थी हम हँसते गाते जिंदगी जी जाते
अब मिले हैं मुकद्दर से तो आंसू ही सही 

..........
ठहराव बहुत ही मुख्तसर लिखा
उसने मेरे हिस्से में सफर लिखा

कलम ने ईमान से अगर लिखा
कोहीनूर का नाम पत्थर लिखा

.......
घरों बसाने वालों ने बाग भी कई उजाड़े
काटे गए दरख्तों पर घोंसले भी थे कई 

बसावट की आंधी में छप्पर ही नहीं उड़े
भूखे प्यासे मरने वाले परिंदे भी थे कई



बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

एक नामुराद दिन का हिसाब


खुशबु के झोंके की तरह नहीं आता अब !

ना मेरी रातों के अँधेरे पर चांदनी बन कर उतरता है कोई.

आहटें गुज़रती तो हैं रात ढले तक सडक पर

जागती आंखों में ख्वाब बन कर कोन ठहरता है?

कमरे में बस एक जम गया सन्नाटा होता है

या फिर दीवार पर खुद अपना साया होता है.

यूँ ही गुजर रही हैं शबो-रोज की घडियाँ

सूरज की पहली किरण के साथ

कलेंडर के पालने में

उजाला तारीख बन कर जन्मता है.

निराशा की धूप नयी नाकामी के मज़ार पर

हसरतों के फूल बिखेर जाती है,

इस तरह लम्हों की मरीचका का मारा

एक और नामुराद दिन,

वक्त की रेत में प्यासा दफन हो जाता है.           

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

बेइतेजार निशब्दता


भरे गले से

कोई कुछ कह गया था,

फिर जाने युग बीते 

सदिया गुजरी

या पल कटे,

किसी की रो ना सकी आँखे

हाफ़िज़

रूमी

मंसूर

खय्याम को पढ रही हैं

चुपचाप. 

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

दर्पण झूठा है



चेहरों के भीतर देखा ही नहीं
आईने ने सच बोला ही नहीं 

नज़ारो से उलझ आई निगाह
मंज़र के भीतर देखा ही नहीं 

दुनिया की खोज करने वाला
अपने आप से मिला ही नहीं

मरीज़ेगम मोत को साथ रख
मय रोग भी है दवा ही नहीं 

एक परछाई है परदे के पीछे
उस पार कोन है पता ही नहीं

माटी राख धुंआ धूल आलम
आखिर में कुछ बचा ही नहीं

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012


बेईमानी के इस गलीज़ दोर में ईमान की सनद रहे
जाली सिक्कों के बाज़ार में कुछ ही लोग नकद रहे 

  
यही धुंधलका रहा तो मुस्तकबिल सियाह है आगे
लिख जाता हूँ तेरे लिए दोरेहाज़िर ताकि सनद रहे

दीवारों पर बड़े साये देख कर खुश हो रहे थे लोग
ढलती धूप ने खूब जता दिया बोने अपने कद रहे

अब तक जो भी मिले, गुजरी सांसों की खेरात थे
ये किसे मालूम हमारे पास दिन कितने नकद रहे

खामोशी के गीतों में सजे तो शोर में सन्नाटे बने
हवाओं की तरह मेरी सोच के दायरे भी बेहद रहे

जुगनूओं ने अपनी रोशनी का पूरा रखा एहतराम
वो वहां नहीं चमके आलम जहां सूरज की हद रहे 

गलीज़-गंदे,मुस्तकबिल-भविष्य, सियाह-काला,दोरेहाज़िर-वर्तमानकाल,एहतराम-आदर