सोमवार, 19 नवंबर 2012

तू ही तू है


तमाम दरख्त कलम बन कर लिखते हैं
उसके होने की गवाही समंदर लिखते हैं

लहू के कतरों से उसकी ही हम्दो सना
अहले जनून सूलियों के उपर लिखते हैं

रूप जिसका कोई नहीं सबसे है रूपवान
बखान उसी के रस में डूबकर लिखते हैं

उसके बेशक्ल होने की सनद है कायनात 
उसी की शान प्रेमी पत्थर पर लिखते हैं

किरणों को कलम बना कर उसकी स्तुर्ती
अपने उजाले में शम्सओकमर लिखते हैं

तुम हो अव्वल ता आखिर तुम्हारा जिक्र
गुलुकार गा रहे हैं जो सुखनवर लिखते है

किसने कहा ग्यानी हैं हम पागल आलम
प्यार की तलाश में ढाई अक्षर लिखते है

दरख्त-पेड , हम्दो सना-स्तुर्ती , अहले जनून-अभिशिप्त लोग
(प्रेम में),कायनात-स्रटी, शम्सओकमर-चाँद–सूरज, अव्वल ता आखिर-
आरम्भ से अंत तक ,गुलुकार-गायक , सुखनवर-कवि
.......

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