शनिवार, 3 दिसंबर 2011

दो राही अनाम सफर में


मेरे लिए
सराय है ये दुनिया
हर एक मंजिल
रास्ते का पडाव भर है.  
किसी भी दिन
कर्मों की पोटली उठाये
निकल जाऊँगा
गुमनाम सफर में.
पाने की खुशी नहीं थी
खोने का गम किसे होगा.   
सफेदपोश !
जनशोषण से बनी
तेरी अट्टालिकाएँ
आखिर किसके लिए हैं.
क्या तुझको यकीन है
गरीबो का खून चूस कर
अमरत्व पा लिया तूने.
समय के दंश से
कोन बचा है नादान
अब कुछ ऐसा कर कि
जीवन लेखे में
अच्छा लिखा जाए.
तूने देखे होंगे ज़रूर  
कल जिन आवासों में
वक्त के खुदा रहते थे
उनके खंडहरों में
अब भूत बसते हैं.    

2 टिप्‍पणियां:

अनुपमा पाठक ने कहा…

कल जिन आवासों में
वक्त के खुदा रहते थे
उनके खंडहरों में
अब भूत बसते हैं.
मार्मिक सत्य... काश सुन पाते समझ पाते सब!

rafat ने कहा…

जी हाँ यही तो मानव की बड़ी त्रासदी है २ फीसदी ९८ फीसदी के शोषक हैं .यानी हम खुदही के दुश्मन हैं सो आपने सटीक टिप्पणी फरमाई है