बुधवार, 28 मार्च 2012

कमज़ोर की नहीं दुनिया


पाँव चलना सीखने के दिन से
ताकतवर होने के कारण
तुम मुझ पर सवार रहे हो
तुम्हारे आदेशों की मार
उन दिशाओं पर लेजाती रही है मुझे
जिनके रास्ते तुम्हारी मंजिल निकलती है.
मुझे चलना ही होता है
तुम्हारे विश्व विजयी सपनों के साथ
कभी तलवार बनता हूँ
कभी तुलिका –कूची
कभी छेनी या फावड़ा
तुम्हारे नाम पर कायम सभी आश्चर्य
मेरी मजबूर बेगार की देन है.
मेने अपना सर कटा कर
तुम्हारे माथे पर मुकुट रखा है
पर मेरी शहादत के हिस्से में
सदा ही कुचले हुए हाथ आये
तुम्हारी आन सही साबित होती रही  
बिना पँजों के फिर मुझसे
नये पेरामिड-ताजमहल नहीं बने.
मैं दूर से देखता हूँ आज भी 
धर्मस्थलो के रोशन दीपक
जिन्हें मेरे मलीन हाथों की मिटटी ने
आकार दिया पर
जोत छूने का मुझे अधिकार नहीं
मेरी घडी गयी ईंटों पर खड़े है खुदा के घर
जिनकी सीडियों पर कदम रखना तो दूर
सर भी नवा नहीं सकता मैं.
सदियाँ कालगर्भ में खोई होंगी
फिर भी 
जो गुजरा है अभी नहीं बिसरा
पवित्र स्तुर्ती सुनने की सजा
याद रहे
अछूत नापाक कानों ने
पिघला हुआ सीसा पीकर पाई है.  
अब भी कुछ नहीं बदला है
कमज़ोर और ताकतवर के बीच
साम दाम दंड भेद का मालिक सबल है
लहू पसीना अश्रु बहाने वाला निर्बल है.
अपनी सियारी चाल के चलते
तुम कई बार मेरी झोपडी में
रात काटने के बाद
उडनखटोलों  में उड़ जाते हो
सरझुकों की सरझुकाई तो देखो
खटिया पर राजा जी तुम्हारे लेटने से
भूखा नंगा गावं बेमोल बिक जाता है
कागज की तीतरी हाथ में लेकर
तुम्हे विधायक भवन में छोड़ आता है ताकि
सकून से तुम नीली तस्वीरें देख सको
जो तुम्हारा असल चलन चरित्र और चेहरा है.
अस्तित्व की जंग में
आस उम्मीद उमंग हारने के बाद
सब दुआओं के फ़िज़ूल हो जाने के बाद
एक बात ये स्पस्ट हुई  
न कंटीली ज़मीन मेरी
न पथराया आकाश मेरा
कमज़ोर हूँ सर्वहारा हूँ शोषित हूँ बेचारा हूँ मैं
अपनी अभिशिप्त नियति का मारा हूँ मैं.  

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

बेमानी तलाश


खुदा कहाँ है भगवान कहाँ है
ज़मीन तेरा आसमान कहाँ है
अपने भीतर को देखुं तो सही
मेरी तलाश है शेतान कहाँ है
सब हैं आदमी तो भला फिर    
क्या ढूँढना के इंसान कहाँ है
उम्मीद में हमको बरसों बीते
मरना इतना आसान कहाँ है
छप्परों की बात फिर करूँगा 
देखूं अपना आसमान कहाँ है
मुंबईकर बिहारी सब हैं मगर    
भाई! मेरा हिन्दुस्तान कहाँ है
मंदिर मस्जिद रहे वो सामने  
यारो! दारु की दुकान कहाँ है
उजाड में ही बसते है सन्नाटे
खाली ये दिल वीरान कहाँ है

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

काश!जीवन बच्चा बना रहता


काश!जीवन बच्चा बना रहता
दिलों की स्लेटों पर
संवेदनाओं के चाक से खिचीं           
आडी तिरछी मासूम रेखाएं
अ, ए और अलीफ़ की
दुनियादारी से आज़ाद
परियों, चिड़ियों, गुड़ियों, तारों के
सपने बुना करतीं
बुनती रहतीं.
काली, सफेद, भूरी धरती पर  
देशों, सरहदों, रंग-नस्ल
की जंजीरों,  
धर्म, जात-पात, उंच–नीच
की झंझटो,
गरीबी, अमीरी, भूख, प्यास
की आफतों,   
युद्ध, खूँरेजी, आतंकी मोर्चो से मुक्त    
नीले आकाश की पवित्रता निहारता
काश!जीवन बच्चा बना रहता.     

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

वो अब अवतार-पैगम्बर नहीं देता


पुकारते है बंदे ध्यान आसमान मगर नहीं देता
किस खता में वो अब अवतार-पैगम्बर नहीं देता
मेरे पास दुआओं की कमी नहीं मगर नहीं देता
किसी को अपने नसीब से मिले पत्थर नहीं देता
किस गुनाह की सजा में दिए ये बेमकसद नजारे
परदे में ही रहना था तो मुझको नज़र नहीं देता   
माना तुमने दिए है जख्म पर लोटाऊ किस तरह 
बेईमान दिल किसी का क़र्ज़ लोटा कर नहीं देता
किनारों से बस लहरों की अठखेलिया दिखती हैं 
डुबोए बगेर गहराई का अंदाजा समंदर नहीं देता
उसके बिना भी रात की सीमा न घटी न बढ़ी है
फिर क्या बात है के नींद मुझे बिस्तर नहीं देता
उसके इन्साफ पर केसे ऊँगली उठाई जाए के जो
किसीको देता है महल किसीको छप्पर नहीं देता
मजदूर के हाथों को मेहनत बहुत बख्शता है वो    
मजदूर के हाथ की लकीरों को मुकद्दर नहीं देता
शहर के खुदाओं बंदगी के तोर न सिखाओ मुझे
जान तो दे दूं हर किसी चोखट पे सर नहीं देता
जाने कितनी बार मरा होगा वो खुद का कातिल
यूँ ही तो कोई अपने ख़्वाबों को ज़हर नहीं देता
पत्थरों की मार झेलता रहा हूँ सदा से मैं दीवाना
अक्ल होती पास तो बेईमानों के ठोकर नहीं देता
जहाँ थक जाओगे वही पर ठहर जाना है आलम
मंजिलों का सुराग मुसाफिर को सफर नहीं देता

रविवार, 1 जनवरी 2012

मंजिल का असल रास्ता


गोर से देखो चोराहे
किसी को भ्रम में नहीं रखते
रास्तो को ठहराते तो हैं रोकते नहीं.
मुसाफिर सब अपने सफर में
दाएँ-बाएँ या सीधे चले जारहे हैं
उन्हें अपना गंतव्य है पता,
जो राशन की तलाश से लेकर
तारे तोड़ लाने की तम्मना तक
कुछ भी हो सकता है.
ये और बात है हर मंजिल से
फिर नया रास्ता निकल जाता है
यानी मंजिल और चोराहे के बीच
कोई अंतर ही नहीं है.
चलते रह सकें यदि कदम
धरती के छोर पार
आकाश की सीमा से गुज़र जाएँ.
मुसाफिरों को क्या मालूम  
मंजिल और चोराहे के बीच से
आकाश की सीमा के पार
मोत के रास्ते से गुजरना होता है
जो जीते जी संभव नहीं.

बिस्तर का बंटवारा


देर से देख रहा हूँ
करवट लिए तुम
खामोशी के केक्ट्स
होंटों पर रखे
गुलाबों की गयी रूतें
तलाश रही लगती हो.
मैं सिगरेट के धुंएं की   
कसेली गंध के बीच
अपनेपन की खुशबू ढूढ़ रहा हूँ
जो कभी
साँझा दोलत थी अपनी.
खाली जेबों वाले अमीर
मुस्कान के पुल से गुजर के
सकून घर लाया करते थे.
क्या पता था
तारे तोड़ लाने की धुन में
खुद से भी बिछड़ जायेगे हम.   
शहर की रात रोज ही
देखा करती है किस तरह
बर्फ हुए अहसास की सिलें
जिस्मों बीच में रख कर
बिस्तर का बंटवारा कर लेते हैं
नींद को तरसते दो बदन. 

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

लावारिस आँखे कभी नहीं रोती


बहुत से आँसू
किसी अपने काँधे की तलाश में
जगहँसाई का सामान बनकर  
बह जाते है फ़िज़ूल
संतावना देने वाले मुखोटे
अब कोई नहीं ओढता
चेहरे पर मुस्कान सजाये रखना
बहरूपी जीवन की मजबूरी है.
कुछ एक आँसू
रात के अँधेरे में मोती
दर्द के तन्हा साथी
आँखों के खजानों से
बिखर कर
उदासी के गहरे धुंधलके को
उजला कब कर पाते हैं.  
कितने ही नम तकिये
हज़ार बहानों से
नींद की भीख माँगते हैं रोज
जो करवटों में मिल भी जाए अगर
दिल के ज़ख्मों का चेन कहाँ?
अनमोल है वो आँसू जो
आँखों के दरवाज़ों पर
कभी दस्तक ही नहीं देते
आरज़ुओं के उजड़े घर में
सारी नाकामियों को
वक्त से मिली दुत्कारों को
अहसास के बख्शे ज़ख्मों को
सहलाया करते है.
अनाथ बच्चों के सरों पर जेसे
हाथ रखती हो माँ की याद
सदा के लिए खोने का घाव
कसकता भी है तो दवा बनकर
दर्द से भरी लावारिस आँखे
कभी नहीं रोती.