गुरुवार, 5 जनवरी 2012

वो अब अवतार-पैगम्बर नहीं देता


पुकारते है बंदे ध्यान आसमान मगर नहीं देता
किस खता में वो अब अवतार-पैगम्बर नहीं देता
मेरे पास दुआओं की कमी नहीं मगर नहीं देता
किसी को अपने नसीब से मिले पत्थर नहीं देता
किस गुनाह की सजा में दिए ये बेमकसद नजारे
परदे में ही रहना था तो मुझको नज़र नहीं देता   
माना तुमने दिए है जख्म पर लोटाऊ किस तरह 
बेईमान दिल किसी का क़र्ज़ लोटा कर नहीं देता
किनारों से बस लहरों की अठखेलिया दिखती हैं 
डुबोए बगेर गहराई का अंदाजा समंदर नहीं देता
उसके बिना भी रात की सीमा न घटी न बढ़ी है
फिर क्या बात है के नींद मुझे बिस्तर नहीं देता
उसके इन्साफ पर केसे ऊँगली उठाई जाए के जो
किसीको देता है महल किसीको छप्पर नहीं देता
मजदूर के हाथों को मेहनत बहुत बख्शता है वो    
मजदूर के हाथ की लकीरों को मुकद्दर नहीं देता
शहर के खुदाओं बंदगी के तोर न सिखाओ मुझे
जान तो दे दूं हर किसी चोखट पे सर नहीं देता
जाने कितनी बार मरा होगा वो खुद का कातिल
यूँ ही तो कोई अपने ख़्वाबों को ज़हर नहीं देता
पत्थरों की मार झेलता रहा हूँ सदा से मैं दीवाना
अक्ल होती पास तो बेईमानों के ठोकर नहीं देता
जहाँ थक जाओगे वही पर ठहर जाना है आलम
मंजिलों का सुराग मुसाफिर को सफर नहीं देता

1 टिप्पणी:

श्याम जुनेजा ने कहा…

दिल को छू गए यह शिकवे !