देर से देख रहा हूँ
करवट लिए तुम
खामोशी के केक्ट्स
होंटों पर रखे
गुलाबों की गयी रूतें
तलाश रही लगती हो.
मैं सिगरेट के धुंएं की
कसेली गंध के बीच
अपनेपन की खुशबू ढूढ़ रहा हूँ
जो कभी
साँझा दोलत थी अपनी.
खाली जेबों वाले
अमीर
मुस्कान के पुल से
गुजर के
सकून घर लाया करते
थे.
क्या पता था
तारे तोड़ लाने की
धुन में
खुद से भी बिछड़
जायेगे हम.
शहर की रात रोज ही
देखा करती है किस तरह
बर्फ हुए अहसास की सिलें
जिस्मों बीच में रख कर
बिस्तर का बंटवारा कर लेते हैं
नींद को तरसते दो
बदन.
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