रविवार, 1 जनवरी 2012

बिस्तर का बंटवारा


देर से देख रहा हूँ
करवट लिए तुम
खामोशी के केक्ट्स
होंटों पर रखे
गुलाबों की गयी रूतें
तलाश रही लगती हो.
मैं सिगरेट के धुंएं की   
कसेली गंध के बीच
अपनेपन की खुशबू ढूढ़ रहा हूँ
जो कभी
साँझा दोलत थी अपनी.
खाली जेबों वाले अमीर
मुस्कान के पुल से गुजर के
सकून घर लाया करते थे.
क्या पता था
तारे तोड़ लाने की धुन में
खुद से भी बिछड़ जायेगे हम.   
शहर की रात रोज ही
देखा करती है किस तरह
बर्फ हुए अहसास की सिलें
जिस्मों बीच में रख कर
बिस्तर का बंटवारा कर लेते हैं
नींद को तरसते दो बदन. 

कोई टिप्पणी नहीं: