शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

लावारिस आँखे कभी नहीं रोती


बहुत से आँसू
किसी अपने काँधे की तलाश में
जगहँसाई का सामान बनकर  
बह जाते है फ़िज़ूल
संतावना देने वाले मुखोटे
अब कोई नहीं ओढता
चेहरे पर मुस्कान सजाये रखना
बहरूपी जीवन की मजबूरी है.
कुछ एक आँसू
रात के अँधेरे में मोती
दर्द के तन्हा साथी
आँखों के खजानों से
बिखर कर
उदासी के गहरे धुंधलके को
उजला कब कर पाते हैं.  
कितने ही नम तकिये
हज़ार बहानों से
नींद की भीख माँगते हैं रोज
जो करवटों में मिल भी जाए अगर
दिल के ज़ख्मों का चेन कहाँ?
अनमोल है वो आँसू जो
आँखों के दरवाज़ों पर
कभी दस्तक ही नहीं देते
आरज़ुओं के उजड़े घर में
सारी नाकामियों को
वक्त से मिली दुत्कारों को
अहसास के बख्शे ज़ख्मों को
सहलाया करते है.
अनाथ बच्चों के सरों पर जेसे
हाथ रखती हो माँ की याद
सदा के लिए खोने का घाव
कसकता भी है तो दवा बनकर
दर्द से भरी लावारिस आँखे
कभी नहीं रोती.
       

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

माटी का सफर


मुट्ठीभर माटी हूँ
मुझे खूब पता है.
आँख की किरकरी
बनने के बदले
क़दमों तले बिछने में
विश्वास करती है
यह माटी ताकि
रास्तों के काँटों से 
नंगे पाँव बच सकें
बगूलों की तरह
माहोल धूलीया जाने में
अपना नहीं भरोसा 
जो बस चले
प्यासों के मटकों हेतु
रोंधा जाना
या बच्चों के खिलोनों में
ढाला जाना पसंद करूँगा.
पर आजकल
बस्ती के नलके
खुद प्यासे हैं
पानी जहां है
‘पयूरिफायरों’ में से होकर
गुज़रता है.
बच्चे या तो
भीख के लिए हाथ पेलाये
बाप की दारु का साधन हैं 
या फिर टेडीबीयर से
खेलते है.
चाक और अलाव
गुज़रे वक्त की बातें बने
हुनरमंद हाथ जो  
ताजमहल के साथ ही
कटने शुरू होगए थे
मशीनों तले दब कर
सब मर गए हैं.
अभी तो
गुमशुदा सफर में हूँ
आगे तुम्हारी मर्ज़ी
चार काँधों पर उठाने वाले  
कहाँ अँधेरे गार में रखेंगे 
या फिर
आवारगी की
किसी मंजिल पर
चील-कोवे मुझे
निबटा रहे होगे
क्या ही पता? 

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

नई प्रेम कहानी


आजकल मोहब्बत के रास्ते
फूलों की वादी में न रुककर
“डिस्को” के दरवाजों से गुज़रते हैं.
मेपल के दरख्त कट गए कबके
कंकरीट का जंगल बस गया है
उन पार्कों की लाशों पर
जहां कभी होंठों के बीच
गुलाब रखे जाते थे.
सड़कों पर सरेआम चुम्बन
‘मोडर्न’ प्यार की शान है.
दिल अहसास के घर कहाँ हैं अब
वे भी कम्पुटर बन गए हैं
तस्वीर भा जाए तो “सेव”
“डिलीट” करना मर्ज़ी की बात है.
कंडोमी संबंधों के दोर में    
मजनू की “चूइंगम” बनी लेला
लेला का “माऊथफ्रेशनर” है मजनू
यह नई प्रेम कहानी है.

शनिवार, 3 दिसंबर 2011


कहा गया था
आसान होगा सफ़र
लाखों हरे दरख्तों बलि लेकर
चोडी भी हुई राजमार्ग की सड़कें.
मगर तवायफ की जवानी सा
चमकीला हुस्न
उधड़ गया–बिखर गया
चंद दिनों में.
वही सडक अब
हज़ार पेबंद लगाए
अपनी ओड़नी में
टूटा फूटा बदसूरत जिस्म लिए   
मुसाफिरों से माफ़ी मांगती
लग रही है.
दलाल-भडवे सब
मिलवाट के हिस्से लेकर
कही ओर भ्रस्टाचार की चाशनी
चाटने में जा लगे.
सफ़र जो था सो है वेसा ही
वही है फासला
बस और हवाईजहाज़ के बीच.
२.
हवा पानी अन्न फल सब्जी सब किये विषेले
हर जिंदगी को लाभ की प्रयोगशाला बनाकर
मोत के व्योपारी स्वयं ह्रदय पकडे मर रहे है   
हमारा हाजमा तो देखो जिंदा हैं जहर खाकर.       

दो कविताएँ


१.
मंदिरों की आरती और
मस्जिदों में नमाज़ के दोरान
दरख्तों की टहनियों  में
पक्षीयों की चहचहाट सुन कर
कई बार सोचता हूँ  
ऊँचे आकाश में उड़ने वाले
इन बेमज़हब जीवों की बंदगी
कहीं मुझसे ऊँची तो नहीं.
२.
हज़ार बंधनों में है जीवन
यूँही कई बार सोचता हूँ
धरती की झंझटों से दूर
काश आकाश में उड़ता
स्वछंद पक्षी होता.
पर किसे मालूम होता है 
भाग्य का लिखा
तब भी क्या पता
पंख कतरा केदी बनकर  
पिंजरे में लटका रहता. 

दो राही अनाम सफर में


मेरे लिए
सराय है ये दुनिया
हर एक मंजिल
रास्ते का पडाव भर है.  
किसी भी दिन
कर्मों की पोटली उठाये
निकल जाऊँगा
गुमनाम सफर में.
पाने की खुशी नहीं थी
खोने का गम किसे होगा.   
सफेदपोश !
जनशोषण से बनी
तेरी अट्टालिकाएँ
आखिर किसके लिए हैं.
क्या तुझको यकीन है
गरीबो का खून चूस कर
अमरत्व पा लिया तूने.
समय के दंश से
कोन बचा है नादान
अब कुछ ऐसा कर कि
जीवन लेखे में
अच्छा लिखा जाए.
तूने देखे होंगे ज़रूर  
कल जिन आवासों में
वक्त के खुदा रहते थे
उनके खंडहरों में
अब भूत बसते हैं.    

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

अनसुलझी पहली


इस चिड़ियाघर की चावं-चावं में
कोयल की उन्मुक्त कूक
सुनने की आस है फ़िज़ूल.
बेहतर है कहीं अपने भीतर
स्वरलहरी तलाश.
तुझ पर खुल सकता है
आवाजों का तलिस्म,
तितली के रेशमी परों की
सरसराहटह का गीत.  
कली के चटखने की सदा
में छिपा फूल खिलने का राज़.
जाती आहटों के तले कुचली गयी  
चरमराती
सूखी पत्तियों की वेदना
ज़रूर कुछ समझा सकती है तुझे.
देख तो सही आवारा भवंरों केसे  
पुष्पों के आनन पर
प्रेम कहानियाँ लिख रहे है.
गोर से सुनने का प्रयास कर  
क्या पता गहरे नीले आकाश तले  
तुझ पर बयान हो जाए
ऊँची डाल पर गाते पंछी का वह नगमा   
जो अभी तक
किसी सुर में उतरा ही नहीं.   

रविवार, 27 नवंबर 2011

बेसकून शहर


अब ये शहर
रात को भी सोता नहीं.
आहटों का शोर
दरवाजों तक आकर
बिना दस्तक दिए
लोट जाता है.
किवाड खोल कर देखो तो
सामने सड़क पर
भागते हुए कदम
सिर्फ हादसे की आवाज़ पर
ठहरते हैं.
नींद का ऊँघता सफर
बेरंग लिफाफे की तरह
बेमंजिल जमा हो जाता है
सूरज के घर.

शनिवार, 26 नवंबर 2011

निरुत्तरित प्रश्न


क्या है उस पार
जहां ज़मीन आसमान से मिलती है
अन्धकार, ज्योति या फिर
कुछ भी नहीं.
जीवन अनुमानित मार्ग भर है
उस अजान मंजिल का
जो मरे बाद ही मिलती है.
राख या ख़ाक उड़ कर
जाने कहाँ जाती है
किसे मालूम
मुरदे तो कभी बोले नहीं हैं.

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

जीवन एक गुमनाम सफ़र


घडी की सरकती सुइयाँ बाँचते हुए कलेंडर के पन्ने
पलट कर बालों में सफेदियाँ भरते जा रहे हैं.
चेहरे की झुर्रियों के तजुर्बे और नादानियों का    
बोझ उठाये कमान हो चली है कमर.
जिंदगी तेरे सफर में, सब मंजिलें हैं रास्ते के पड़ाव
पथ चल रहा है निरंतर, पता ही नहीं ठिकाना है किधर.
फिर भी क्षितिज पार उजाला सा नज़र आता है  
लगता है कहीं धरती से आकाश मिलने वाला है.
यूँ हो यदि, आँखों में पथरीला असीम अँधकार सिमटने लगे
ओ! खेलखिल्लिया-अदेखे जादूगर.    
एक बार फिर मुझे,निर्भय, निर्विकार बच्चा बना देना ताकि
कर्मों का लेखा पढ़े जाते समय, मुस्करा कर मचल सकूं.

बुधवार, 23 नवंबर 2011

कसाईखाने की भेड़ें


महल की छत से
सड़कें अच्छी नहीं लगती
इसे किसी सोच का कसूर केसे कहूँ
ऊँचाइयों से वाकई
ज़मीन के मंज़र छोटे नज़र आते हैं.
असल अपराधी वे बेचेहरा लोग हैं जो
बुलंदियों के सम्मोहन में बंधे
ऊँची बालकनियाँ तकते हुए
अपनी पगड़ीयाँ खुद के पावों में पाते हैं.
आलीशान मंचों से
फेंकें गए सस्ते उपहार झपटते हुए
कुचले जाते हैं
मारे जाते हैं.
भीड़ का मोल है भी क्या?
मांसरहित हड्डियों के पिंजरों का  
लहू थूकते हुए
चुल्लू दाऊ में डूबकर  
अकाल मरण.
अनेतिकता की हद तो देखो
शराब सरकारी खज़ाने की जान है  
एक रूपये की बोतल सो की बिकती है
चिल्लर चिल्लर जेबें खाली होकर
चंद तिजोरियों में सोना भर रही हैं.
करोड़ों हैं खाली हाथ
जिनकी मेहनत का फल
चंद मोटे पेटों ने डकार लिया है. 
बेआत्मा के ये हत्यारे    
धर्म-जाति में बंटवारा करके  
उत्तेजक नारों के सहारे
सदा संवेदनाओं का शेतानी खेलते हैं
यानी वही दंगे-फसाद
वही नापाक धुर्विकरण समाज का.     
वही हवाई वादे 
रोटी, मकान, कपड़ा
रोज़गार, बिजली, पानी देने के
जो है ही नहीं  
ये देंगे कहाँ से.
बेइमानों से कोन करे सवाल
सुबह के भूखे को
शाम की रोटी चाहिए होती है 
चंद बोतलें दारु की कुछ सो के नोट
वोटों की पेटियां भर देते है.
कुर्सी रहे सलामत   
कमीशन की कालिख भरी अटेचीया
क़दमों में धरे
सफेदपोश! भ्रस्टाचार के जनक
भ्रस्टाचार मिटाने की कसमें खा रहे हैं.
भोली जनता की मूर्खता भी है खूब
कागज़ के घोडे पर सवार
सतयुग आने का विश्वास कर बेठी है.
हरियाली के सपनों में खोयी
भेडों का कतारबद्ध सफर है जारी  
उन्हें कहाँ है पता कि
सीडियाँ चड़ने का जो भी रास्ता है
कसाईखाने से होकर गुज़रता है.