गुरुवार, 29 नवंबर 2012

मिला कुछ नहीं .


मैं सुनहरे कल के लिए जान कुर्बान कर दूगा मगर
मसीहा बनने वाले तू अपने साथ सलीब लाया क्या ?
तमाम इन्कलाब आखिर महलों के हिमायती निकले
कोई बताओ फुटपाथ ने ठोकरों के सिवा पाया क्या ?

सतयुग तक में यीशु को पाकदामन एक वेश्या ही मिली
आज हर कोई ईमान की दुहाई दे रहा है, बड़ा मजाक है
हम्माम के सब नंगे जेसे काजल की कोटरी से निकले हैं
फिर भी दाढ़ी में तिनका दिखाई दे रहा है, बड़ा मजाक है

जिसके पास गुजरबसर से ज्यादा है वो तुम्हारा है
भीख के लिए फेले हुए हाथो छीनने कब निकलोगे
सोने भरी कमजर्फ तिजोरियां यूँ नहीं खुलने वाली
टूटेंगे खजानो के ताले भी साथ जब सब निकलोगे

भीड़ को इक्कठा करने के लिए कोई शोर है ज़रूरी
ईमान का ढोल लेकर निकलने वाले खूब जानते हैं
पतंगे होती ही कटने, काटने, लूटने, फाड़ने के लिए
खेंच-ढील के दाव में माहिर हवा के रुख पहचानते हैं 

सोमवार, 19 नवंबर 2012

तू ही तू है


तमाम दरख्त कलम बन कर लिखते हैं
उसके होने की गवाही समंदर लिखते हैं

लहू के कतरों से उसकी ही हम्दो सना
अहले जनून सूलियों के उपर लिखते हैं

रूप जिसका कोई नहीं सबसे है रूपवान
बखान उसी के रस में डूबकर लिखते हैं

उसके बेशक्ल होने की सनद है कायनात 
उसी की शान प्रेमी पत्थर पर लिखते हैं

किरणों को कलम बना कर उसकी स्तुर्ती
अपने उजाले में शम्सओकमर लिखते हैं

तुम हो अव्वल ता आखिर तुम्हारा जिक्र
गुलुकार गा रहे हैं जो सुखनवर लिखते है

किसने कहा ग्यानी हैं हम पागल आलम
प्यार की तलाश में ढाई अक्षर लिखते है

दरख्त-पेड , हम्दो सना-स्तुर्ती , अहले जनून-अभिशिप्त लोग
(प्रेम में),कायनात-स्रटी, शम्सओकमर-चाँद–सूरज, अव्वल ता आखिर-
आरम्भ से अंत तक ,गुलुकार-गायक , सुखनवर-कवि
.......

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

एक भेड़ की व्याथा


मैं जनता हूँ
वह भीड़ या कहो भेड
जिसे हर समय खंड में
सत्ता सुख तलाशते कसाइयों ने
क्रान्ति का शहीदी जामा पहना कर
सडक पर लाकर
संवेदनाओं की उलटी छुरी से
बलि किया है.
कोई बताए किस आंदोलन ने धरती पर
स्वर्ग उतारा है.
वही है कमज़ोर त्रस्त-पस्त जो कि था
वही है ताकतवर ज़बरदस्त जो कि था.
फिर भी आज अगर तुम लोग
ईमान का आकाश छूने बात कर रहे हो
ओ! ज़बानी उन्माद से पागल करने वालो  
ये तो बताओ मैं केसे
उस ज़मीन पर उतरूंगा कि जहां
लेनदेन के घूसखोर दोर की कमाई से अटे
हम सभी के गोपनीय लाकरों की चाभियाँ छिपी है
अंतरात्मा की आवाज़ पर सबसे पहले
मसीहा से बीमार तक आओ
अपने खजाने खोलो
फिर किसी आंदोलन की ज़रूरत नहीं होगी
पर क्या ऐसा होगा
सत्ता सुख तलाशने वालो ! 

सोमवार, 5 नवंबर 2012

जिंदगी के सफर में...


जिंदगी तेरे सफर में
लाल कालीनों पर चल कर
चाँद तारे पकड़ने को आतुर हैं लोग.  
भ्रस्टाचार की खाद बिखेरती
हीरे पन्ने जड़ी अंगुठियां
स्वर्ण वर्क्षों की फसलें खड़ी कर रही हैं.
सोने चांदी रत्नों के खजाने
तिजोरियों के अन्धकार को सुपर्द करने वालो    
ये सरमाया नंगी भूखी जनता के लिए 
रोटी कपड़ा और मकान का साधन बन सकता था
वक्त की सियाह कब्रों में दफीना बना जा रहा है
आखिर किस काम का है.
नींद की गोलियों के खाली रेपर हैं गवाह
मीडासों  के सकून का हिसाब
रेशमी चादरों पर करवटों में लिखा है.   
जिंदगी तेरे सफर में
पसीने की नदी के गोते खा कर
कोडियों की तलाश में हैं लोग
जो भी अक्सर उनकी पकड़ से दूर हैं.
दिन भर कमर तोड मजदूरी से
पीठ से चिपका हुआ भूखा पेट
दुखने लगता है.
कुदाल फावड़े अपना उधार चुक लेते है
मेहनतकश हाथों के छाले
बुझे चूल्हों पर पक कर सो जाते हैं.
जिंदगी तेरे सफर में
चमक दमक की खुद्फरेबी से लाख बहला करे कोई 
दोलत की चकाचोंध  से चुंधियाई आंखों को
नींद मयस्सर नहीं है.   
नाग बन कर खजानो पर बेठे निर्मम लोगो  
तुम्हे भूत बनने तक जागते रहना होगा.