रविवार, 14 अक्टूबर 2012

चालीसवा तबादला



अभी बहुत अधिक समय नहीं हुआ एक सरकारी कारिंदे ने

ईमानदार होने की सज़ा अपनी जान से हाथ धो कर पायी थी 

फिर भी कीचड में कमलों ने खिलना नहीं छोड़ा.

यह सही है प्यादों ने फरजी बन कर 

ईमान के सूरज को गिरवी रख लिया है

बंदरबाट खा रही है किरण किरण उजाला. 

हताश करते इस निराशामय अन्धकार में 

तबादलों/गालियों/गोलियों की सज़ा से बेपरवाह

अपना घर जला कर रौशनी का इंतज़ाम करने वाले 

बाकी हैं अभी

ताकि चोपट राज में खून से लिखी तहरीरें गवाही दें 

कि भ्रस्ट कालखंड में भी कुछ लोग ईमान की सनद रहे.

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012


अच्छा इसी में है कम कहें
सुने कोन है जो हम कहें

तेरी ज़ात से जो अता हो
उस दर्द को केसे गम कहें

ज़ब्त की लाज इसी में है  
ज़ख्मों को भी मरहम कहें 

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तेरा यही इरादा है जिंदगी तो यूँ ही सही
अक्ल ओ होश न सही हमे जुनूं ही सही

तय हुआ चाहत के सफर में नहीं मिलेंगे
मर्ज़ी आपकी यही है तो चलो यूँ ही सही

चाह थी हम हँसते गाते जिंदगी जी जाते
अब मिले हैं मुकद्दर से तो आंसू ही सही 

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ठहराव बहुत ही मुख्तसर लिखा
उसने मेरे हिस्से में सफर लिखा

कलम ने ईमान से अगर लिखा
कोहीनूर का नाम पत्थर लिखा

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घरों बसाने वालों ने बाग भी कई उजाड़े
काटे गए दरख्तों पर घोंसले भी थे कई 

बसावट की आंधी में छप्पर ही नहीं उड़े
भूखे प्यासे मरने वाले परिंदे भी थे कई



बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

एक नामुराद दिन का हिसाब


खुशबु के झोंके की तरह नहीं आता अब !

ना मेरी रातों के अँधेरे पर चांदनी बन कर उतरता है कोई.

आहटें गुज़रती तो हैं रात ढले तक सडक पर

जागती आंखों में ख्वाब बन कर कोन ठहरता है?

कमरे में बस एक जम गया सन्नाटा होता है

या फिर दीवार पर खुद अपना साया होता है.

यूँ ही गुजर रही हैं शबो-रोज की घडियाँ

सूरज की पहली किरण के साथ

कलेंडर के पालने में

उजाला तारीख बन कर जन्मता है.

निराशा की धूप नयी नाकामी के मज़ार पर

हसरतों के फूल बिखेर जाती है,

इस तरह लम्हों की मरीचका का मारा

एक और नामुराद दिन,

वक्त की रेत में प्यासा दफन हो जाता है.           

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

बेइतेजार निशब्दता


भरे गले से

कोई कुछ कह गया था,

फिर जाने युग बीते 

सदिया गुजरी

या पल कटे,

किसी की रो ना सकी आँखे

हाफ़िज़

रूमी

मंसूर

खय्याम को पढ रही हैं

चुपचाप. 

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

दर्पण झूठा है



चेहरों के भीतर देखा ही नहीं
आईने ने सच बोला ही नहीं 

नज़ारो से उलझ आई निगाह
मंज़र के भीतर देखा ही नहीं 

दुनिया की खोज करने वाला
अपने आप से मिला ही नहीं

मरीज़ेगम मोत को साथ रख
मय रोग भी है दवा ही नहीं 

एक परछाई है परदे के पीछे
उस पार कोन है पता ही नहीं

माटी राख धुंआ धूल आलम
आखिर में कुछ बचा ही नहीं