पाँव चलना सीखने के
दिन से
ताकतवर होने के कारण
तुम मुझ पर सवार रहे
हो
तुम्हारे आदेशों की मार
उन दिशाओं पर लेजाती
रही है मुझे
जिनके रास्ते
तुम्हारी मंजिल निकलती है.
मुझे चलना ही होता
है
तुम्हारे विश्व
विजयी सपनों के साथ
कभी तलवार बनता हूँ
कभी तुलिका –कूची
कभी छेनी या फावड़ा
तुम्हारे नाम पर कायम
सभी आश्चर्य
मेरी मजबूर बेगार की
देन है.
मेने अपना सर कटा कर
तुम्हारे माथे पर
मुकुट रखा है
पर मेरी शहादत के हिस्से
में
सदा ही कुचले हुए हाथ
आये
तुम्हारी आन सही साबित
होती रही
बिना पँजों के फिर मुझसे
नये पेरामिड-ताजमहल नहीं
बने.
मैं दूर से देखता
हूँ आज भी
धर्मस्थलो के रोशन
दीपक
जिन्हें मेरे मलीन हाथों की मिटटी ने
आकार दिया पर
जोत छूने का मुझे अधिकार
नहीं
मेरी घडी गयी ईंटों
पर खड़े है खुदा के घर
जिनकी सीडियों पर
कदम रखना तो दूर
सर भी नवा नहीं सकता
मैं.
सदियाँ कालगर्भ में
खोई होंगी
फिर भी
जो गुजरा है अभी
नहीं बिसरा
पवित्र स्तुर्ती सुनने की सजा
याद रहे
अछूत नापाक कानों ने
पिघला हुआ सीसा पीकर
पाई है.
अब भी कुछ नहीं बदला
है
कमज़ोर और ताकतवर के
बीच
साम दाम दंड भेद का
मालिक सबल है
लहू पसीना अश्रु बहाने
वाला निर्बल है.
अपनी सियारी चाल के
चलते
तुम कई बार मेरी
झोपडी में
रात काटने के बाद
उडनखटोलों में उड़ जाते हो
सरझुकों की सरझुकाई
तो देखो
खटिया पर राजा जी तुम्हारे लेटने से
भूखा नंगा गावं बेमोल बिक
जाता है
कागज की तीतरी हाथ
में लेकर
तुम्हे विधायक भवन
में छोड़ आता है ताकि
सकून से तुम नीली
तस्वीरें देख सको
जो तुम्हारा असल चलन
चरित्र और चेहरा है.
अस्तित्व की जंग में
आस उम्मीद उमंग
हारने के बाद
सब दुआओं के फ़िज़ूल
हो जाने के बाद
एक बात ये स्पस्ट हुई
न कंटीली ज़मीन मेरी
न पथराया आकाश मेरा
कमज़ोर हूँ सर्वहारा
हूँ शोषित हूँ बेचारा हूँ मैं
अपनी अभिशिप्त नियति
का मारा हूँ मैं.