रविवार, 27 नवंबर 2011

बेसकून शहर


अब ये शहर
रात को भी सोता नहीं.
आहटों का शोर
दरवाजों तक आकर
बिना दस्तक दिए
लोट जाता है.
किवाड खोल कर देखो तो
सामने सड़क पर
भागते हुए कदम
सिर्फ हादसे की आवाज़ पर
ठहरते हैं.
नींद का ऊँघता सफर
बेरंग लिफाफे की तरह
बेमंजिल जमा हो जाता है
सूरज के घर.

शनिवार, 26 नवंबर 2011

निरुत्तरित प्रश्न


क्या है उस पार
जहां ज़मीन आसमान से मिलती है
अन्धकार, ज्योति या फिर
कुछ भी नहीं.
जीवन अनुमानित मार्ग भर है
उस अजान मंजिल का
जो मरे बाद ही मिलती है.
राख या ख़ाक उड़ कर
जाने कहाँ जाती है
किसे मालूम
मुरदे तो कभी बोले नहीं हैं.

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

जीवन एक गुमनाम सफ़र


घडी की सरकती सुइयाँ बाँचते हुए कलेंडर के पन्ने
पलट कर बालों में सफेदियाँ भरते जा रहे हैं.
चेहरे की झुर्रियों के तजुर्बे और नादानियों का    
बोझ उठाये कमान हो चली है कमर.
जिंदगी तेरे सफर में, सब मंजिलें हैं रास्ते के पड़ाव
पथ चल रहा है निरंतर, पता ही नहीं ठिकाना है किधर.
फिर भी क्षितिज पार उजाला सा नज़र आता है  
लगता है कहीं धरती से आकाश मिलने वाला है.
यूँ हो यदि, आँखों में पथरीला असीम अँधकार सिमटने लगे
ओ! खेलखिल्लिया-अदेखे जादूगर.    
एक बार फिर मुझे,निर्भय, निर्विकार बच्चा बना देना ताकि
कर्मों का लेखा पढ़े जाते समय, मुस्करा कर मचल सकूं.

बुधवार, 23 नवंबर 2011

कसाईखाने की भेड़ें


महल की छत से
सड़कें अच्छी नहीं लगती
इसे किसी सोच का कसूर केसे कहूँ
ऊँचाइयों से वाकई
ज़मीन के मंज़र छोटे नज़र आते हैं.
असल अपराधी वे बेचेहरा लोग हैं जो
बुलंदियों के सम्मोहन में बंधे
ऊँची बालकनियाँ तकते हुए
अपनी पगड़ीयाँ खुद के पावों में पाते हैं.
आलीशान मंचों से
फेंकें गए सस्ते उपहार झपटते हुए
कुचले जाते हैं
मारे जाते हैं.
भीड़ का मोल है भी क्या?
मांसरहित हड्डियों के पिंजरों का  
लहू थूकते हुए
चुल्लू दाऊ में डूबकर  
अकाल मरण.
अनेतिकता की हद तो देखो
शराब सरकारी खज़ाने की जान है  
एक रूपये की बोतल सो की बिकती है
चिल्लर चिल्लर जेबें खाली होकर
चंद तिजोरियों में सोना भर रही हैं.
करोड़ों हैं खाली हाथ
जिनकी मेहनत का फल
चंद मोटे पेटों ने डकार लिया है. 
बेआत्मा के ये हत्यारे    
धर्म-जाति में बंटवारा करके  
उत्तेजक नारों के सहारे
सदा संवेदनाओं का शेतानी खेलते हैं
यानी वही दंगे-फसाद
वही नापाक धुर्विकरण समाज का.     
वही हवाई वादे 
रोटी, मकान, कपड़ा
रोज़गार, बिजली, पानी देने के
जो है ही नहीं  
ये देंगे कहाँ से.
बेइमानों से कोन करे सवाल
सुबह के भूखे को
शाम की रोटी चाहिए होती है 
चंद बोतलें दारु की कुछ सो के नोट
वोटों की पेटियां भर देते है.
कुर्सी रहे सलामत   
कमीशन की कालिख भरी अटेचीया
क़दमों में धरे
सफेदपोश! भ्रस्टाचार के जनक
भ्रस्टाचार मिटाने की कसमें खा रहे हैं.
भोली जनता की मूर्खता भी है खूब
कागज़ के घोडे पर सवार
सतयुग आने का विश्वास कर बेठी है.
हरियाली के सपनों में खोयी
भेडों का कतारबद्ध सफर है जारी  
उन्हें कहाँ है पता कि
सीडियाँ चड़ने का जो भी रास्ता है
कसाईखाने से होकर गुज़रता है.

फाकों की विरासत


रेशम के कीड़े का
मुक्कदर लेकर आने वालो
कब तक खुद में ही घुट कर
मरते रहोगे.
कबतक तुम्हारी रगों से खिंचा सोना
महाजन की दोलत बनता रहेगा
किसानों-मजदूरो कब तक
फाकों की विरासत बनते रहोगे.
क़र्ज़ में गिरवी खेत और हुनर
ब्याज में चुकतारा कर आने वालो
आत्महत्या के लिए 
ज़हर ढूँढते फिरोगे कबतक.    
कभी तो तुम भी
ज़हर का तोड़ ज़हर से करने की
हिम्मत करो
अत्याचार केवल डर की भाषा
समझता है
उठो, नागरूपी फुंकार भरो.
जाबेठो उन अकूत खजानो पर
जो दरअसल तिजोरिओं में बंद
लहू-पसीने से सिंच कर
लहलहाई वह फसल है
जिसके अंतिम वारिस तुम हो.
-रफत आलम -

     

रविवार, 20 नवंबर 2011

दो कविताएँ


1.
वह साज़
महफिलों का उजाला,
अनेक धुनों का जनक था
कहीं भीतर से टूट कर
अब खामोश है.
सतही रूप में अच्छा भला
पर नाकारा
यूँही कबाड सा पड़ा है.
गीतों को नए बाजे मिल गए हैं
बेसुरे ही सही
लोगों को नचवाने के लिए
काफी हैं.
2.
जो दिखता है बहुधा
वेसा होता नहीं
किसको पता
मुस्कान ओढ़े
मुखोटे के पीछे
सूनी आँखों में
जमे हुए अहसास का  
बर्फीला समुद्र जमा है.