महल की छत से
सड़कें अच्छी नहीं लगती
इसे किसी सोच का कसूर केसे कहूँ
ऊँचाइयों से वाकई
ज़मीन के मंज़र छोटे नज़र आते हैं.
असल अपराधी वे बेचेहरा लोग हैं जो
बुलंदियों के सम्मोहन में बंधे
ऊँची बालकनियाँ तकते हुए
अपनी पगड़ीयाँ खुद के पावों में पाते हैं.
आलीशान मंचों से
फेंकें गए सस्ते
उपहार झपटते हुए
कुचले जाते हैं
मारे जाते हैं.
भीड़ का मोल है भी
क्या?
मांसरहित हड्डियों
के पिंजरों का
लहू थूकते हुए
चुल्लू दाऊ में डूबकर
अकाल मरण.
अनेतिकता की हद तो
देखो
शराब सरकारी खज़ाने
की जान है
एक रूपये की बोतल
सो की बिकती है
चिल्लर चिल्लर
जेबें खाली होकर
चंद तिजोरियों में
सोना भर रही हैं.
करोड़ों हैं खाली
हाथ
जिनकी मेहनत का फल
चंद मोटे पेटों ने
डकार लिया है.
बेआत्मा के ये हत्यारे
धर्म-जाति में बंटवारा करके
उत्तेजक नारों के
सहारे
सदा संवेदनाओं का
शेतानी खेलते हैं
यानी वही दंगे-फसाद
वही नापाक धुर्विकरण
समाज का.
वही हवाई वादे
रोटी, मकान, कपड़ा
रोज़गार, बिजली,
पानी देने के
जो है ही नहीं
ये देंगे कहाँ से.
बेइमानों से कोन
करे सवाल
सुबह के भूखे को
शाम की रोटी चाहिए
होती है
चंद बोतलें दारु की
कुछ सो के नोट
वोटों की पेटियां भर
देते है.
कुर्सी रहे सलामत
कमीशन की कालिख भरी
अटेचीया
क़दमों में धरे
सफेदपोश! भ्रस्टाचार
के जनक
भ्रस्टाचार मिटाने
की कसमें खा रहे हैं.
भोली जनता की
मूर्खता भी है खूब
कागज़ के घोडे पर
सवार
सतयुग आने का
विश्वास कर बेठी है.
हरियाली के सपनों में
खोयी
भेडों का कतारबद्ध
सफर है जारी
उन्हें कहाँ है पता कि
सीडियाँ चड़ने का जो
भी रास्ता है
कसाईखाने से होकर
गुज़रता है.