बुधवार, 26 दिसंबर 2012

सदमे भूलना आसान कहाँ ऐ दिल


हवसकार बन्दों को मुहब्बतों से सरोकार नहीं रहा
बेगेरत बसते हैं अब इस बस्ती में प्यार नही रहा

दीवारों से गुफ्तगू करके घर की खामोशी सो गयी
दरवाज़े को भी किसी आहट का इन्तेज़ार नहीं रहा

ऊँगली पकड के चलना जिनको हमने सिखाया था
अब उनको हमारे रास्तों से कोई सरोकार नहीं रहा

जिंदगी की हर साँस उसी के नाम है ये और बात  
लबों पर खामोशी कहती है मैं उसे पुकार नहीं रहा

दुनिया से रूठ कर अपने ही अंदर जा खोया हूँ मैं
अब किसी के रहमओकरम का गुनाहगार नहीं रहा

खोये हुओं पर भरोसा करना वेसे भी फ़िज़ूल होता
अच्छा हुआ जो दोस्त तुझे मुझपे ऐतबार नहीं रहा

मैं तो खुद को भुला के एक पल में उसे भूल गया
सुना है वो भी मेरे गम में बहुत सोगवार नहीं रहा

ले दे के खुशबू थी जिसे भी चमन की हवा ले उडी
मोसमे बहार पर कभी फूलों का इख्तियार नहीं रहा

कोई तो साबित करो इस बस्ती में आदमी रहता है
आदमी की दरिंदगी से आदमी पर एतबार नहीं रहा

लाश बोलती नहीं और गवाहों को जान का था डर  
कातिल भी हाथ धोके खून का जिम्मेवार नहीं रहा

दरिंदे खुले में नोचते फिर रहे है आदमी को आलम
जेसे इस बस्ती पर अल्लाह का इख्तियार नहीं रहा