बेईमानी के इस गलीज़ दोर में ईमान की
सनद रहे
जाली सिक्कों के बाज़ार में कुछ ही
लोग नकद रहे
यही धुंधलका रहा तो मुस्तकबिल सियाह है आगे
लिख जाता हूँ तेरे लिए दोरेहाज़िर ताकि सनद रहे
दीवारों पर बड़े साये देख कर खुश हो रहे थे लोग
ढलती धूप ने खूब जता दिया बोने अपने कद रहे
अब तक जो भी मिले, गुजरी सांसों की खेरात थे
ये किसे मालूम हमारे पास दिन कितने नकद रहे
खामोशी के गीतों में सजे तो शोर में सन्नाटे बने
हवाओं की तरह मेरी सोच के दायरे भी बेहद रहे
जुगनूओं ने अपनी रोशनी का पूरा रखा एहतराम
वो वहां नहीं चमके आलम जहां सूरज की हद रहे
गलीज़-गंदे,मुस्तकबिल-भविष्य, सियाह-काला,दोरेहाज़िर-वर्तमानकाल,एहतराम-आदर